मुंबई, (वार्ता) बम्बई उच्च न्यायालय ने गुरुवार को एक राजनीतिक कार्यकर्ता के सरकारी फैसलों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने पर एक वर्ष के लिए तड़ीपार (जिलाबदर) करने की कार्रवाई के पुलिस को आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही न्यायालय ने टिप्पणी की कि नागरिकों के साथ “भारत सरकार के गुलामों” जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता।
यह आदेश न्यायमूर्ति माधव जामदार ने सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी (49) की याचिका पर सुनवाई के बाद दिया। इस याचिका में पुलिस उपायुक्त के तीन दिसंबर 2025 को पारित तड़ीपार के आदेश को चुनौती दी गई थी। बाद में कोंकण संभाग के संभागीय आयुक्त ने 27 मार्च 2026 को आदेश को बरकरार रखा था। पुलिस ने जिलाबदर करने की यह कार्रवाई श्री चौधरी के नागरिकता संशोधन अधिनियम और ज्ञानवापी मस्जिद मामले सहित केंद्र सरकार के फैसलों के विरोध में मोर्चा और धरना देने पर दर्ज 5 प्राथमिकियों पर आधारित थी।
न्यायमूर्ति जामदार ने टिप्पणी की, “याचिकाकर्ता ने केवल ‘भाजपा सरकार मुर्दाबाद’, ‘अमित शाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाए हैं। नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते? विरोध करना नागरिकों का अधिकार है।” न्यायालय ने कहा कि पुलिस लोक सेवक है, “मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की सेवक” नहीं।
इस कार्रवाई को दुर्भावनापूर्ण बताते हुए न्यायाधीश ने कहा कि सरकारी फैसलों के खिलाफ मोर्चा और धरना आयोजित करना महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत तड़ीपार करने का आधार नहीं हो सकता।
आदेश में उल्लेख किया गया कि संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा सम्मान के साथ जीने के अधिकार की गारंटी देते हैं, और याचिकाकर्ता के खिलाफ की गई कार्रवाई ने उसके मौलिक अधिकारों को प्रभावित किया है। न्यायालय ने तड़ीपार आदेशों को रद्द करते हुए रिट याचिका का निपटारा कर दिया।
