कार्यकारिणी जारी होते ही सतह पर आ गई कांग्रेस की कलह


ग्वालियर चंबल डायरी

हरीश दुबे

ग्वालियर कांग्रेस में महाभारत मचा है। यूं तो पार्टी स्थानीय स्तर पर तमाम गुटों एवं उपगुटों में विभाजित है लेकिन अंदरूनी कलह को छिपाने के लिए छत्रप एकजुटता का दिखावा करते रहे हैं। इस छद्म एकजुटता की पोल ग्वालियर शहर जिला कांग्रेस कमेटी की बहुप्रतीक्षित कार्यकारिणी के घोषित होते ही खुल गई। इधर सूची भोपाल से ग्वालियर आई और इसी के साथ पार्टी में इस्तीफों की झड़ी लग गई। कार्यकारिणी में जिन्हें मनवांछित वजन नहीं मिला या जो हाशिए पर खिसका दिए गए, उन्होंने स्थानीय नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इस्तीफा देने वालों में लतीफ खान मल्लू, थाटीपुर के ऊदल सिंह और प्रतीक जैन जैसे कांग्रेस के नामचीन चेहरे शुमार थे।

मल्लू और ऊदल तत्कालीन अध्यक्षों की टीम में संगठन प्रभारी, उपाध्यक्ष और महासचिव जैसे बड़े ओहदों को संभाल चुके थे लेकिन अब मौजूदा अध्यक्ष सुरेन्द्र यादव की टीम में डिमोशन कर इन्हें सेक्रेट्री बना दिया। सूची जारी होते ही इन्होंने जीतू पटवारी को अपने इस्तीफे भेज दिए। प्रतीक जैन को हालांकि जनरल सेक्रेट्री बनाया गया लेकिन वे भी दो लाइन का इस्तीफा देकर जिलाध्यक्ष की टीम से रुखसत हो लिए। इससे पहले कि और पदाधिकारी इस्तीफा देते, विधायक सतीश सिकरवार और बालेंदु शुक्ल की सलाह पर जीतू पटवारी ने कार्यकारिणी को होल्ड पर ले लिया।

डिमोशन होने वालों में पूर्व विधायक प्रवीण पाठक के करीबी पिंकी पंडित भी शामिल थे लेकिन उन्होंने इस्तीफा देने के बजाए पाठक से मिलकर अपनी नाराजगी जताई। सचिव बनाए गए पप्पू श्रीवास भी कोपभवन में हैं। बहरहाल, संतुलित और सर्वमान्य कार्यकारिणी बनाने में नाकामी के बाद जिलाध्यक्ष सुरेन्द्र यादव मुश्किल से घिर गए हैं। अब तक दबे छिपे मुहिम चलाने वाले गुट खुलकर ताल ठोक रहे हैं। पार्टी में यह स्थिति तब बनी है जब पार्टी को कुछ महीनों बाद ही निकाय चुनाव के समर में जाना है। बहरहाल, जिलाध्यक्ष ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया है कि सूची तैयार करने में उनकी अकेले भूमिका नहीं है, क्योंकि कार्यकारिणी बनाने जैसे निर्णय सभी वरिष्ठ नेताओं के राय मशविरे से होते हैं। वे यह भी कह रहे हैं कि ग्वालियर से भोपाल तक पार्टी पूरी तरह एकजुट है।

जीतने के लिए कुछ भी करेंगे, हाउसों के बीच दुरभि संधियाँ…

मप्र चेंबर ऑफ कॉमर्स एण्ड इंडस्ट्रीज के चुनावों का रोमांच अब शबाब पर पहुंचता जा रहा है। सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण के साथ रोचक मुकाबला अध्यक्ष पद पर हो रहा है। व्हाइट हाउस के प्रत्याशी पारस जैन और टिकट न मिलने पर इसी हाउस से बगावत कर निर्दलीय ताल ठोकने वाले डॉ. प्रवीण अग्रवाल ने चुनाव जीतने के लिए पूरा दम खम लगा दिया है। क्रिएटिव हाउस ने बाकी ओहदों के लिए तो प्रत्याशी मैदान में उतार दिए लेकिन सोची समझी रणनीति के तहत अध्यक्ष पद पर असमंजश की स्थिति बरकरार रखते हुए प्रत्याशी खड़ा नहीं किया। तो क्या क्रिएटिव हाउस डॉ. प्रवीण अग्रवाल को समर्थन दे रहा है? इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं है। बाजार में खबर है कि प्रवीण को शिकस्त देने के लिए व्हाइट और क्रिएटिव ने गुप्त गठबंधन कर लिया। दरअसल, पिछली दो बार के चुनाव में प्रवीण ने क्रिएटिव के दो मजबूत स्तंभों को हराया था। इस हार को हाउसों की प्रतिद्वंदता के बजाए निजी रंजिश मानते हुए क्रिएटिव के चुनाव प्रबंधकों ने प्रवीण को हराने के लिए व्हाइट हाउस से हाथ मिला लिया है। क्रिएटिव से अध्यक्ष पद लेने के एवज में व्हाइट हाउस ने दो सीटों पर जानबूझकर कमजोर प्रत्याशी उतारे हैं ताकि क्रिएटिव को दो सीटें सहजता से मिल सकें। इन दुरभि संधियों के बावजूद प्रवीण अग्रवाल के हौंसले पहले जैसे ही हैं। कई प्रमुख बाजारों की एसोसिएशनें उनके समर्थन में आ गई हैं।

कांग्रेस में एक और बड़े पाला बदल की तैयारी…

एक ओर उपचुनाव से पहले दतिया में नरोत्तम मिश्रा बड़े स्तर पर कांग्रेस में तोड़फोड़ करने में जुटे हैं वहीं ग्वालियर में भी एक बार फिर से बड़े दलबदल की पटकथा लिख ली गई है। राजनीतिक कयास लगाए जा रहे हैं कि कुछेक दिन में कांग्रेस के असंतुष्ट घटक के कई छोटे बड़े चेहरे सिंधिया और सीएम के समक्ष पंजे को छिटककर भगवा रंग में रंगेंगे। यह सच है कि अंचल में कांग्रेस इस वक्त सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है। सत्ता दल की वीथिकाओं में दावा तो यहां तक किया जा रहा है कि कांग्रेस के कुछेक विधायक भी निष्ठा परिवर्तन कर सकते हैं लेकिन रामनिवास रावत के एपीसोड के बाद इसकी गुंजाइश कम ही है। विधायक मिशन 28 से पहले उपचुनाव की रिस्क मोल लेने के मूड में नहीं हैं। इतना तय है कि विधायक न सही, पदाधिकारियों और पुराने कार्यकर्ताओं का ही सही, निकाय चुनाव से पहले पालाबदल का बड़ा खेला होना पक्का मानिए।

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