संगीत सम्राट आर.डी. बर्मन जिन्होंने सिर्फ 9 साल की उम्र में ही पहली धुन तैयार कर ली थी। आर.डी. बर्मन ने अपने करियर में सैकड़ों यादगार गीत दिए।
हिंदी सिनेमा के संगीत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो समय की सीमाओं को लांघकर अमर हो जाते हैं। राहुल देव बर्मन यानी हम सबके चहेते पंचम दा एक ऐसी ही शख्सियत थे, जिन्होंने फिल्म इंडस्ट्री को वेस्टर्न और भारतीय संगीत का एक जादुई कॉकटेल दिया। आज उनकी जयंती के मौके पर दुनिया उन्हें याद कर रही है। पंचम दा का संगीत आज भी हर पीढ़ी के दिलों में धड़कता है, लेकिन इस चमकती सफलता के पीछे एक ऐसा इंसान भी था जिसने जीवन में कई गहरे उतार-चढ़ाव देखे।
आर डी बर्मन का नाम पंचम दा पड़ने के पीछे की कहानी बेहद दिलचस्प और उनके जन्म से ही संगीतकार होने का प्रमाण है। आर डी बर्मन जब बेहद छोटे थे और रोते थे, तो उनके रोने की आवाज में भी संगीत के 5 सुर सुनाई देते थे। हिंदी सिनेमा के दिग्गज एक्टर अशोक कुमार ने जब उनके इस अनोखे हुनर को करीब से देखा, तो उन्होंने प्यार से राहुल देव बर्मन को ‘पंचम’ कहना शुरू कर दिया।
9 साल की उम्र में पिता से बगावत
संगीत के प्रति पंचम दा की दीवानगी बचपन से ही इस कदर थी कि पढ़ाई-लिखाई से उनका मन पूरी तरह उठ गया था। महज 9 साल की उम्र में उन्होंने 9 बेहतरीन धुनें तैयार कर ली थीं। जब उनके पिता ने उनकी इस प्रतिभा को परखा, तो वे हैरान रह गए। हालांकि, इसके बाद एक ऐसी घटना घटी जिसने पिता-बेटे के रिश्ते में कुछ समय के लिए कड़वाहट पैदा कर दी। एस.डी. बर्मन ने पंचम की बनाई धुनों को उनकी परमिशन के बिना अपनी फिल्मों में इस्तेमाल कर लिया, जिससे नाराज होकर युवा पंचम अपने पिता से काफी दिनों तक रूठे रहे।
एक जुनूनी फैन से अनोखी शादी का सफर
पंचम दा का शुरुआती शादीशुदा जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। उनकी पहली पत्नी रीता पटेल उनकी बहुत बड़ी फैन थीं और उन्होंने अपनी सहेलियों से शर्त लगाई थी कि वे इस फेमस संगीतकार को डेट पर लेकर जाएंगी। यह मुलाकात प्यार में बदली और साल 1966 में दोनों ने शादी कर ली।
दुर्भाग्य से यह रिश्ता केवल 5 साल ही चल सका। इसके बाद उनके जीवन में गायिका आशा भोसले की एंट्री हुई। दोनों ने संघर्ष के दिनों में एक-दूसरे का साथ दिया और साल 1980 में शादी के बंधन में बंध गए, लेकिन जीवन के अंतिम पड़ाव पर पंचम दा की जीवनशैली के कारण इस रिश्ते में भी दूरियां आ गईं।
सफलता के शिखर से गुमनामी की दास्तान
60 और 70 के दशक में ‘तीसरी मंजिल’ और अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र की ‘शोले’ जैसी फिल्मों से सफलता का नया इतिहास रचने वाले इस जादूगर का अंतिम समय काफी दर्दनाक रहा। जीवन के आखिरी दौर में वे बुरी आदतों के शिकार हो गए, जिससे उनके करियर और तबीयत दोनों पर बुरी तरह प्रभाव पड़ा।
एक समय ऐसा भी आया जब फिल्म इंडस्ट्री ने इस महान फनकार पंचम दा से मुंह मोड़ लिया और उन्हें काम मिलना बंद हो गया। आर्थिक तंगी और अकेलेपन में फंसे हुए आखिरकार साल 1994 में महज 54 वर्ष की आयु में पंचम दा ने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनके बनाए गीत आज भी फिजाओं में गूंज रहे हैं।
