कान्हा में नहीं थम रहा बाघों की मौत का सिलसिला

बालाघाट: विश्व प्रसिद्ध कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघों की लगातार हो रही मौतों ने एक बार फिर वन विभाग की कार्यप्रणाली और वन्यजीव संरक्षण के दावों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। ताजा मामले में मुक्की क्वारंटाईन सेंटर में उपचाररत एक बाघ की सोमवार को मौत हो गई। लगातार हो रही बाघों की मौतों से यह सवाल उठने लगा है कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद कान्हा में बाघ कितने सुरक्षित हैं?

जानकारी के अनुसार 4 जून 2026 को किसली परिक्षेत्र के कक्ष क्रमांक 777 स्थित सन्दूक खोल क्षेत्र में हाथी गश्ती के दौरान एक बाघ गंभीर रूप से बीमार अवस्था में मिला था। वन विभाग द्वारा उसका रेस्क्यू कर मुक्की क्वारंटाईन सेंटर में भर्ती कराया गया था। प्रारंभिक जांच में उसमें केनाइन डिस्टेंपर रोग के लक्षण पाए गए थे। इसके बाद विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम लगातार उसका उपचार कर रही थी, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद बाघ की जान नहीं बचाई जा सकी।

बार-बार मौतें, लेकिन जवाबदेही तय कब होगी?
कान्हा टाइगर रिजर्व देश और दुनिया में बाघ संरक्षण के मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यहां वन्यजीव संरक्षण के नाम पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन इसके बावजूद लगातार सामने आ रही बाघों की मौतें कई गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। यदि बाघ लंबे समय से बीमार था तो बीमारी की समय पर पहचान और रोकथाम के लिए क्या कदम उठाए गए? क्या निगरानी व्यवस्था पूरी तरह प्रभावी थी? क्या संक्रमण को अन्य वन्यजीवों तक फैलने से रोकने के लिए पर्याप्त उपाय किए गए?

फंड खर्च, लेकिन परिणाम कहां?
वन्यजीव संरक्षण, निगरानी, गश्त, स्वास्थ्य परीक्षण और उपचार के लिए भारी भरकम बजट स्वीकृत किया जाता है। इसके बावजूद यदि लगातार बाघों की मौतें हो रही हैं तो संरक्षण योजनाओं की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। स्थानीय लोगों और वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि केवल प्रेस विज्ञप्तियां जारी करने से जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती, बल्कि यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि आखिर ऐसी घटनाओं के लिए जवाबदेह कौन है।

NTCA प्रोटोकॉल के तहत हुई कार्रवाई
बाघ की मृत्यु के बाद राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के दिशा-निर्देशों के अनुसार पोस्टमार्टम किया गया। विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम ने शव परीक्षण कर महत्वपूर्ण अंगों को सुरक्षित पाया तथा मृत्यु के वास्तविक कारणों की पुष्टि के लिए विसरा नमूने फॉरेंसिक जांच हेतु भेजे गए हैं। बाद में अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और निर्धारित समिति की उपस्थिति में बाघ का भस्मीकरण किया गया।

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