मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का बड़ा फैसला

सतना:जबलपुर हाईकोर्ट ने सतना जिला अदालत का आदेश किया निरस्त, 17.59 एकड़ बहुमूल्य सरकारी भूमि के मामले में सुनवाई बहाल करने के निर्देश दिएअदालत ने कहा वकील की अनुपस्थिति या तकनीकी खामियों के कारण जनहित और सार्वजनिक संपत्ति के मामलों को न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुए स्पष्ट किया है कि बहुमूल्य सरकारी भूमि और व्यापक जनहित से जुड़े मुकदमों को केवल तकनीकी आधारों या वकीलों की अनुपस्थिति के कारण खारिज नहीं किया जाना चाहिए।

माननीय न्यायमूर्ति रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की एकल पीठ ने सतना जिले की एक मूल्यवान सरकारी जमीन से जुड़े मामले में निचली अदालत /ट्रायल कोर्ट के पुराने आदेश को अवैध मानते हुए निरस्त कर दिया है और मामले को नए सिरे से गुण-दोष के आधार पर सुनने का आदेश जारी किया है।यह पूरा विवाद सतना जिले के मौजा कृपालपुर तहसील रघुराजनगर में स्थित खसरा नंबर 56 की करीब 17.59 एकड़ मूल्यवान भूमि से संबंधित है, जिसे राज्य सरकार के जल संसाधन विभाग के नियंत्रण वाली शासकीय भूमि बताया गया है। इस भूमि के मालिकाना हक को लेकर वर्ष 1999 में एक सिविल सूट न .115A/1999 दायर किया गया था।

जिसके विरुद्ध राज्य द्वारा व्यवहार वाद क्रमांक 276/21 प्रस्तुत किया गया था जो अदम पैरवी मे ख़ारिज हो गया जिसे पुनः स्थापित करने आदेश 9 नियम 9 का आवेदन कोविड-19 महामारी की परिस्थितियों और शासकीय व्यस्तताओं का हवाला देते हुए शासकीय अधिवक्ता रमेश मिश्रा के माध्यम से न्यायालय मे मामले की बहाली/रेस्टोरेशन के लिए एम जे सी न. 276/2021 लगाया गया था हालांकि, सतना के तृतीय जिला न्यायाधीश ने 25 अगस्त 2025 को तकनीकी व देरी के आधार पर सरकार के इस बहाली आवेदन को नामंजूर कर दिया था, जिसके खिलाफ मध्य प्रदेश शासन ने हाईकोर्ट में विविध अपील विविध अपील न. 3632 / 2026 दायर की थी।
मामले के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में निम्नलिखित मुख्य बातें रेखांकित की हैं प्रक्रियात्मक कानून  न्याय की स्थापना को आगे बढ़ाने के लिए होते हैं, न कि तकनीकी आधार पर वास्तविक और ठोस अधिकारों को खत्म करने के लिए,किसी भी वादी (विशेषकर सरकार) को उसके वकील की अनजाने में हुई चूक या किसी अपरिहार्य शासकीय व्यस्तता के कारण अदालती कार्यवाही से बाहर नहीं किया जा सकता।
उच्च न्यायालय ने सतना जिला अदालत द्वारा 25 अगस्त 2025 को पारित आदेश को कानूनन दोषपूर्ण मानते हुए पूरी तरह से निरस्त  कर दिया है। हाईकोर्ट ने निचली अदालत को निर्देशित किया है कि वह इस मामले को उसके मूल नंबर पर वापस बहाल करे और सभी संबंधित पक्षों को सुनवाई का पर्याप्त और प्रभावी अवसर प्रदान करते हुए कानून के अनुसार नए सिरे से  मामले का निपटारा करे हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उसने मामले के मूल गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और निचली अदालत उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है।
सरकारी प्रयत्न से सम्भव हुआ:रमेश
शासकीय अधिवक्ता एवं लोक अभियोजक रमेश मिश्रा का कहना है कि जिला मजिस्ट्रेट एवं कलेक्टर सतना डॉ सतीश कुमार एस,तहसीलदार सौरभ मिश्रा,एस डी एम राहुल सिलाढ़िया के प्रयत्न से इस आदेश के बाद अब करोड़ों रुपये मूल्य की सरकारी जमीन को लेकर कानूनी लड़ाई फिर से बहाल हो गई है, जिससे सरकारी हितों के संरक्षण की उम्मीदें मजबूत हुई हैं।

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