प्रवेश कुमार मिश्र
नई दिल्ली: देश की राजनीति में इन दिनों एक अभूतपूर्व हलचल देखी जा रही है, दिल्ली से लेकर विभिन्न राज्यों में मौजूद क्षेत्रीय क्षत्रपों द्वारा अपने कुनबे को बचाने की जद्दोजहद राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी राजनीतिक उठा-पटक की ओर इशारा कर रही है. ऐसे में देश के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि क्या एक साथ कई राज्यों में विपक्षी किलों का इस तरह दरकना केवल संयोग है? या किसी सुविचारित राजनीतिक चक्रव्यूह का हिस्सा है?राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि जिस तरह से टीएमसी में मचे घमासान और उसके सांसदों के एक बड़े धड़े द्वारा अलग संसदीय समूह बनाने की घोषणा के तुरंत बाद, महाराष्ट्र में शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट में भी बगावत की तेज सुगबुगाहट सामने आई है. इतना ही नहीं इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश की सियासत में सत्तारूढ़ गठबंधन के सहयोगियों द्वारा सपा के भीतर टूट के दावे किए जा रहे हैं उसको किसी सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में नहीं देखा जा सकता है.
ऐसे में ज्यादातर राजनीतिक जानकार यह कह रहे हैं कि पर्दे के पीछे एक सुनियोजित योजना के तहत भाजपाई रणनीतिकारों द्वारा इसे हवा दी जा रही है. चर्चा है कि दीर्घकालिक रणनीति के तहत सरकार अपनी ताकत बढ़ाने की तैयारी कर रही है. हालांकि वर्तमान परिदृश्य में, लोकसभा में भाजपा नेतृत्व वाली राजग के पास बहुमत तो है, लेकिन संविधान संशोधनों जैसे बड़े फैसलों के लिए आवश्यक दो तिहाई बहुमत का आंकड़ा दूर है. ऐसे में विपक्षी सांसदों की यह बगावत और उनका झुकाव परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से सत्ता पक्ष की ओर होना, निश्चित रूप से संसद में सरकार की संख्या बल को ऐसी ताकत दे सकता है, जो साधारण विधायी प्रक्रियाओं से परे हो.
राजनीतिक जानकारों की मानें तो इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक सिरा परिसीमन विधेयक से जुड़ता दिखाई दे रहा है. क्योंकि अप्रैल 2026 में संसद में लाया गया परिसीमन विधेयक विशेष बहुमत के अभाव में अटक गया था. सूत्र बता रहे हैं कि मानसून सत्र या शीतकालीन सत्र में सरकार इस विधेयक को दोबारा लाकर आगामी लोकसभा चुनावों से पहले देश की राजनीतिक सीमाओं को पुनर्गठित करना चाहती है, जिसके तहत लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव है. महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण देने और नए सिरे से निर्वाचन क्षेत्रों को तय करने वाले इस विधेयक को पारित कराने के लिए संसद में दो तिहाई बहुमत यानी 362 वोट अनिवार्य है. ऐसे में विपक्षी खेमे में मची यह भगदड़ सरकार को उस जादुई आंकड़े के करीब ले जा सकती है, जहां वह बिना किसी क्षेत्रीय गतिरोध के इस कानून को अमलीजामा पहना सके.
हालांकि उक्त बगावत के संदर्भ में कुछ विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्रीय दलों के प्रथम परिवार की निरंकुशता व एकाधिकार कई वरिष्ठ व महत्वाकांक्षी नेताओं को बगावत के लिए मजबूर करता रहा है , ऐसे में इस भगदड़ और टूट के पीछे सिर्फ एक कारण को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता है.बहरहाल, विपक्षी दलों की यह आंतरिक उथल-पुथल भारतीय राजनीति को एक बड़े बदलाव की ओर धकेल रही है. क्योंकि लोकतंत्र की खूबसूरती एक मजबूत सरकार के साथ-साथ एक सजग और एकजुट विपक्ष में ही निहित होती है
