(सौरव शेखर द्वारा)
नयी दिल्ली, 17 जून (वार्ता) विकासशील देशों को केवल इसलिए भारी वित्तीय कीमत चुकानी पड़ रही है, क्योंकि वे विकासशील अर्थव्यवस्थाएं हैं। कर्ज की अत्यधिक ऊंची लागत के कारण उन्हें ब्याज पर सैकड़ों अरब डॉलर ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है, जिसे वह स्कूल, अस्पताल, बुनियादी ढांचे और स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश कर सकते थे।
यह बात बुधवार को जारी संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास (अंकटाड) की एक नयी रिपोर्ट में कही गयी है। “फाइनेंसिंग डेवलपमेंट: एक्सटर्नल फ्लोज़ ऑफ फाइनेंशियल कैपिटल टू डेवलपिंग कंट्रीज़ एंड देयर कॉस्ट (वित्तीय घटनाएं: विकसित देशों के लिए वाह्यऋण सुविधाओं का प्रवाह और उसकी लागत)” शीर्षक इस रिपोर्ट में वैश्विक वित्तीय प्रणाली की चिंताजनक तस्वीर पेश करती है, जिसमें कर्ज के लिए कमजोर देशों को विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में लगातार अधिक ऊंची लागत चुकानी पड़ रही है। विकासील और गरीब देश ऊंची किस्त और सीमित कर्ज के दुष्चक्र में फंस गये हैं।
ऐसे समय में जब दुनिया पहले से ही सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को हासिल करने की राह में पिछड़ रही है, अंकटाड का कहना है कि पूंजी की लागत विकासशील देशों की विकास महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बन गयी है। रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक एसडीजी लक्ष्यों में से केवल 35 प्रतिशत ही वर्तमान में सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं या मध्यम प्रगति दिखा रहे हैं, जबकि कई लक्ष्य ठहर गये हैं या पीछे चले गये हैं। इस गिरावट के पीछे एक बड़ा कारण बढ़ता ब्याज है।
इसमें कहा गया है कि वर्ष 2018 से 2024 के बीच, लगभग 5.5 अरब लोगों की आबादी वाले 99 विकासशील देशों में विकास कार्यों के लिए उपलब्ध सरकारी राजस्व का हिस्सा घटा है, क्योंकि सार्वजनिक संसाधनों का बढ़ता भाग ऋण चुकाने में खर्च हो रहा है।अनुमान है कि 2024 में विकासशील देशों को लगभग 1.5 लाख करोड़ डॉलर का नया बाहरी वित्तीय (बाहरी ऋण) प्रवाह प्राप्त हुआ। इसमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई), पोर्टफोलियो निवेश, ऋण और सरकारों एवं बहुपक्षीय संस्थानों से प्राप्त आधिकारिक हस्तांतरण शामिल थे।
यह राशि पहली नजर में हालांकि बड़ी लगती है, लेकिन विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की विकास आवश्यकताओं और सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक वित्तपोषण की तुलना में यह बहुत कम है। अंकटाड के अनुसार, 2024 में विकासशील देशों ने लगभग 13.4 लाख करोड़ डॉलर का निवेश किया। लेकिन 2030 तक एसडीजी (स्थायी विकास के लक्ष्यों) को हासिल करने के लिए वार्षिक निवेश को बढ़ाकर लगभग 17.7 लाख करोड़ डॉलर करना होगा। इसका अर्थ है कि हर वर्ष लगभग 4.3 लाख करोड़ डॉलर का वित्तीय अंतर बना हुआ है। इस अंतर को भरने के लिए घरेलू और बाहरी दोनों प्रकार के वित्तपोषण में मौजूदा स्तर से लगभग एक-तिहाई वृद्धि की आवश्यकता होगी। लेकिन समस्या यह है कि बाहरी कर्ज का प्रवाह घट रहा है।
अंकटाड की इस रिपोर्ट के अनुसार 2014 से 2024 के बीच विकासशील देशों में घरेलू वित्तपोषण में 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि बाहरी वित्तीय प्रवाह में 18 प्रतिशत की गिरावट आई। इससे विकासशील देशों को अपनी ही संसाधनों पर अधिक निर्भर होना पड़ रहा है।
रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय पूंजी तक पहुंच में भारी असमानता की बात को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है। 2024 में विकसित अर्थव्यवस्थाओं को अपने निवेश वित्तपोषण का 38 प्रतिशत बाहरी स्रोतों से प्राप्त हुआ, जबकि विकासशील देशों को केवल 11 प्रतिशत।
कई निम्न-आय वाले देश अभी भी अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजारों से लगभग बाहर हैं और बहुपक्षीय संस्थानों तथा द्विपक्षीय ऋणदाताओं के ऋण पर निर्भर हैं। पोर्ट के अनुसार, लगभग आधे विकासशील देशों की अंतरराष्ट्रीय बॉन्ड बाजारों तक सार्थक पहुंच नहीं है। अंकटाड ने जोर देकर कहा कि बाहरी पूंजी मुफ्त धन नहीं होती। किसी देश में निवेश या ऋण के रूप में आने वाला प्रत्येक डॉलर अंततः लाभ वापसी, रॉयल्टी भुगतान या ब्याज भुगतान जैसी वित्तीय देनदारियां उत्पन्न करता है।
वर्ष 2024 में विकासशील देशों ने विदेशी निवेशकों और ऋणदाताओं को लाभ, रॉयल्टी और ब्याज के रूप में लगभग 1.07 लाख करोड़ डॉलर का भुगतान किया। इसका अर्थ है कि आने वाले वित्तीय प्रवाह का बड़ा हिस्सा अंततः विकसित देशों के निवेशकों के पास लौट जाता है।
विकासशील देशों की कुल बाहरी देनदारियां अब बढ़कर लगभग 30.7 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच गयी हैं। यद्यपि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश इसका सबसे बड़ा हिस्सा है, लेकिन ऋण सबसे बड़ी चिंता बन चुका है। अंकटाड के विश्लेषण से पता चलता है कि ऋण सेवा लागत ऋण की वास्तविक वृद्धि की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ रही है। 2014 से 2024 के बीच बाहरी ऋण की सेवा लागत ऋण भंडार की वृद्धि की तुलना में दोगुनी से अधिक गति से बढ़ी। पिछले दशक में विकासशील देशों में पोर्टफोलियो निवेशों, जिनमें सरकारी बॉन्ड में निवेश शामिल हैं, के निवेश से मिलने वाले धन की लागत लागत विकसित देशों की तुलना में दोगुनी से भी अधिक रही। मध्यम आय वाली विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को सबसे अधिक वित्तीय लागतों का सामना करना पड़ा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड-19 महामारी और उसके बाद वैश्विक ब्याज दरों में वृद्धि के दौर ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। विकसित देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा मुद्रास्फीति नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने के बाद विकासशील देशों की उधारी लागत में तेज वृद्धि हुई।
हालांकि 2024 और 2025 में उधारी की स्थितियों में कुछ सुधार हुआ है, फिर भी विकासशील देशों को पूँजी जुटाने के लिए विकसित देशों की तुलना में काफी अधिक प्रीमियम चुकाना पड़ रहा है।
रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक निष्कर्ष सरकारी खजाने पर कर्ज की बढ़ती लागत का प्रभाव है। 2014 से 2024 के बीच विकासशील देशों के सरकारी ऋण पर ब्याज भुगतान में 102 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि सरकारी राजस्व केवल 39 प्रतिशत बढ़ा। इसका अर्थ है कि सार्वजनिक संसाधनों का बड़ा हिस्सा ऋण भुगतान में खर्च हो रहा है, जिससे सरकारों के पास विकास कार्यक्रमों में निवेश करने के लिए उपलब्ध वित्तीय गुंजाइश लगातार कम हो रही है। अंकटाड के अनुसार, 2018 से 2024 के बीच 73 प्रतिशत विकासशील देशों की राजकोषीय स्थिति कमजोर हुई है।
रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो न केवल एसडीजी की प्राप्ति प्रभावित होगी, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक विकास और ऋण स्थिरता भी खतरे में पड़ जाएगी। अंकटाड का निष्कर्ष है कि सतत विकास की दिशा में सार्थक प्रगति के लिए वित्त की उपलब्धता और उसकी वहनीयता दोनों से जुड़ी समस्याओं का समाधान आवश्यक है। संगठन का मानना है कि पूंजी प्रवाह बढ़ाने के साथ-साथ विकासशील देशों पर लगाए जाने वाले अत्यधिक जोखिम प्रीमियम को कम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
रिपोर्ट के अनुसार, विकासशील देश दोहरे बोझ का सामना कर रहे हैं, उन्हें अपने विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अधिक पूंजी की आवश्यकता है, लेकिन उसे प्राप्त करने के लिए उन्हें विकसित देशों की तुलना में कहीं अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। वर्ष 2030 के एसडीजी लक्ष्य की समयसीमा नजदीक आने के बीच अंकटाड का स्पष्ट संदेश है कि यदि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था विकासशील देशों को सस्ता और अधिक सुलभ वित्तपोषण उपलब्ध नहीं कराती, तो दुनिया की विकास संबंधी महत्वाकांक्षाएं अधूरी रह सकती हैं।
