इस्लामाबाद | पाकिस्तान इस समय अपनी आंतरिक सुरक्षा के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे प्रांत उग्रवादी हिंसा की चपेट में हैं, जहां विद्रोह पिछले एक दशक के उच्चतम स्तर पर है। एक ओर जहाँ पाकिस्तान में खून-खराबा और आतंकवादी हमले लगातार बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शांतिदूत की छवि बनाने में जुटे हुए हैं।
विफलता और दिखावे की राजनीति
जनरल मुनीर की कूटनीतिक सक्रियता और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है। जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समझौतों में व्यस्त होते हैं, ठीक उसी समय पाकिस्तान में टीटीपी (TTP) और बीएलए (BLA) जैसे संगठन बड़े हमलों को अंजाम देते हैं। 2025 में 3,400 से ज्यादा लोगों की मौत और 2026 के शुरुआती महीनों में ही 1,700 से अधिक मौतों के आंकड़े पाकिस्तान की विफलता की पोल खोलते हैं।
चीनी परियोजनाओं पर बढ़ता खतरा
बलूच अलगाववादियों द्वारा सीपीईसी (CPEC) परियोजनाओं और चीनी नागरिकों को निशाना बनाया जाना पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती है। वहीं, खैबर पख्तूनख्वा में तालिबान समर्थित टीटीपी के बढ़ते हमलों ने पाकिस्तान को अफगानिस्तान के साथ भी सीधे संघर्ष की कगार पर खड़ा कर दिया है। सैन्य अभियानों में मिली असफलता के बाद, देश की आंतरिक स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण से बाहर होती दिख रही है।

