
दिल्ली डायरी प्रवेश कुमार मिश्र। लगभग दो वर्षों के अंतर्द्वंद्व के बाद सिकुड़ते जनाधार के साथ इंडिया समूह की बैठक में शामिल हुए क्षेत्रीय क्षत्रपों ने भले ही आपसी बैर भाव को समाप्त कर गलबहियां करते हुए सार्वजनिक मंच से सार्थक संदेश देने का प्रयास किया हो लेकिन सच्चाई यह है कि अभी भी विभिन्न विषयों को लेकर मतभेद कायम है. चर्चा है कि जिस तरह से लगभग सभी क्षेत्रीय दलों ने अपने सिकुड़ते जनाधार से परेशान होकर कांग्रेसी अगुवाई को अनौपचारिक रूप से स्वीकार किया है उससे साफ है कि अब क्षेत्रीय दलों को भी भाजपा के खिलाफ किलाबंदी करने के लिए कांग्रेसी हाथ और मजबूत साथियों के साथ की जरूरत है. चर्चा यह भी है कि अब इंडिया समूह में शामिल छोटे दल कांग्रेस को आंख दिखाने के बजाय गलबहियां की रणनीति को महत्व देना आरंभ कर चुके हैं. हालांकि कांग्रेस भी समय व परिस्थिति को भांपकर आपसी विवाद पर पानी डालते हुए नई रणनीति के साथ आगे बढ़ने को तैयार दिख रही है.
बिखराव के साथ सिकुड़ गई टीएमसी चुनावी हार और कुनबाई बिखराव के कारण कभी भाजपा के खिलाफ आक्रामक दिखने वाली टीएमसी इन दिनों अस्तित्व बचाने के संकट में उलझ गई है. जिस तरह से ममता बनर्जी व अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व के खिलाफ उनके अपने चहेते विधायकों व सांसदों ने मोर्चाबंदी कर अलग राह अपना ली है उससे साफ है कि ममता के नेतृत्व वाली टीएमसी न सिर्फ कमजोर हो चुकी है बल्कि विघटन के राह पर भी बहुत आगे निकल गई है. हालांकि इस घटनाक्रम को टीएमसी की आंतरिक राजनीति का परिणाम बताकर भाजपाई नेता अपने को इससे अलग कर रहे हैं
लेकिन दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में इस राजनीतिक हालात को शिवसेना के बिखराव की पटकथा से जोड़कर देखा जा रहा है. क्योंकि दिल्ली में टीएमसी सांसदों का भाजपा नेताओं की मौजूदगी में केन्द्रीय मंत्री के आवास पर मिलकर अलग गुट बनाने का निर्णय करना इस उलटफेर के हरेक परत से पर्दा उठा रहा है. डीएमके व आप की अगुवाई में तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट इंडिया समूह बैठक से दूरी बनाकर डीएमके व आप के रणनीतिकारों ने देश के सामने तीसरे मोर्चे के रूप में एक नया राजनीतिक विकल्प देने की तैयारी आरंभ कर दी है. चर्चा है कि अपने अपने प्रभाव वाले राज्यों में कांग्रेस व भाजपा से सीधे टक्कर लेने वाले क्षेत्रीय दलों के नेताओं के बीच पर्दे के पीछे चर्चा जारी है. इसमें डीएमके ,आम आदमी पार्टी, वामदल, टीआरएस यानी बीआरएस, जन सुराज, ओवैसी की पार्टी के अलावा दक्षिण भारत और उत्तर पूर्व के छोटे-छोटे दलों को शामिल करने की बात हो रही है.
