
उज्जैन। महाकाल मंदिर क्षेत्र के विस्तार और सिंहस्थ-2028 की तैयारियों के बीच एक ऐसा भवन खड़ा है। जिसने पांच वर्षों से प्रशासन, नगर निगम, महाकाल मंदिर प्रबंध समिति और विकास एजेंसियों की योजनाओं को उलझाकर रख दिया है। महाकाल लोक के विस्तार में बाधा बने मकान क्रमांक-168, जिसे परचुरे भवन के नाम से जाना जाता है का विवाद आज भी जस का तस बना हुआ है।
वर्ष 2021 में महाकाल मंदिर के सामने स्थित 11 भवनों और जमीनों का अधिग्रहण किया गया था। महाकाल क्षेत्र के विस्तारीकरण, सडक़ चौड़ीकरण, महाकाल वन, नए वेटिंग रूम, टनल और श्रद्धालुओं की सुगम आवाजाही के लिए यह जमीन आवश्यक मानी गई थी। उस समय कलेक्टर रहे आशीष सिंह ने अधिग्रहण प्रक्रिया को आगे बढ़ाया था। आज वे संभागायुक्त और सिंहस्थ मेला अधिकारी हैं, बावजूद पांच साल बाद भी इस परचूरे भवन का मामला सुलझ नहीं पाया है।
12 करोड़ 46 लाख मुआवजा दिया -7 दिन बनाम 5 साल
महाकाल मंदिर प्रबंध समिति ने 11 भवन मालिकों को कुल 12 करोड़ 46 लाख रुपये का मुआवजा दिया था। इनमें 11 करोड़ 9 लाख रुपये जमीन और 1 करोड़ 37 लाख रुपये भवनों के एवज में संबंधितों के खातों में जमा कराए गए। अधिग्रहण के बाद 1274 वर्गमीटर भूमि उपलब्ध होना थी। 5 अक्टूबर 2021 को 10 भवन मालिकों ने मुआवजा लेकर अपनी संपत्तियां सौंप दीं। सिर्फ परचुरे भवन के मालिक ने एक करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा स्वीकार नहीं किया। मकान मालिक ने अधिग्रहण और निर्माण कार्य को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट से स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया। इसके बाद मामला कानूनी प्रक्रिया में उलझ गया। नतीजा यह हुआ कि जिस जमीन पर सात दिन में अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी हो जानी थी, वह पांच साल बाद भी अधूरी है। परचुरे भवन के कारण महाकाल मंदिर के आसपास प्रस्तावित 70 मीटर चौड़ी सडक़ का काम प्रभावित हो रहा है। इसी क्षेत्र में महाकाल वन विकसित किया जाना है, नए वेटिंग रूम बनाए जाने हैं, टनल और वैकल्पिक मार्ग विकसित होने हैं ताकि भविष्य में करोड़ों श्रद्धालुओं और साधु-संतों को सुगम आवागमन की सुविधा मिल सके। इस एक भवन का विवाद पूरे प्रोजेक्ट की गति को थामे हुए है।
कोर्ट कचहरी में उलझा हुआ पूरा मामला
सवाल यह भी है कि जब मुआवजा राशि खातों में जमा हो चुकी थी और अधिकांश भवन मालिक अपनी जमीनें सौंप चुके थे, तब एक मामले का समाधान पांच वर्षों में भी क्यों नहीं निकल पाया। सिंहस्थ-2028 की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है, महाकाल क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण विकास कार्यों में से एक आज भी अदालत और प्रशासनिक फाइलों के बीच अटका हुआ है।
