नयी दिल्ली, 05 जून (वार्ता) उद्योग जगत ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा विदेशी पूंजी आकर्षित करने के उपायों की घोषणा को निवेश बढ़ाने वाला बताया है और कहा है कि रेपो दर को स्थिर तथा रुख को तटस्थ रखकर केंद्रीय बैंक ने नीतिगत स्थिरता का संकेत दिया है। इंजीनियरिंग वस्तुओं के निर्यातकों के संगठन ईईपीसी इंडिया के अध्यक्ष पंकज चड्ढा ने कहा कि बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों और लगातार बनी हुई वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच उठाया गया यह एक ‘विवेकपूर्ण कदम’ है। इससे मौद्रिक नीति में स्थिरता बनी रहेगी। उन्होंने भविष्य में उद्योगों की पूंजी लागत कम करने के लिए रेपो दर में कटौती की उम्मीद जतायी। उद्योग संगठन एसोचैम के महासचिव सौरभ सान्याल ने कहा कि अनिश्चित वैश्विक आर्थिक माहौल और पश्चिम एशिया में युद्ध जैसी परिस्थितियों के बावजूद इस वित्त वर्ष में भी भारत की आर्थिक वृद्धि मजबूत बनी रहने की उम्मीद है। इस बीच, आरबीआई का यह निर्णय आर्थिक विकास को समर्थन देने और मुद्रास्फीति को लक्ष्य सीमा के भीतर बनाये रखने के बीच संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव, ईंधन की कीमतों पर संभावित प्रभाव, व्यापार प्रवाह और मुद्रास्फीति संबंधी जोखिमों जैसी बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच आरबीआई द्वारा नीतिगत लचीलापन बनाये रखना सराहनीय है। कोटक महिंद्रा एएमसी के सीआईओ-डेट दीपक अग्रवाल ने कहा कि केंद्रीय बैंक द्वारा मुद्रास्फीति अनुमान बढ़ाने और वृद्धि दर का अनुमान घटाने का मुख्य कारण ऊर्जा लागत में वृद्धि, उसके कारण होने वाले प्रभाव और पश्चिम एशिया युद्ध से उत्पन्न भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं हैं। मुद्रास्फीति का अनुमान हालांकि अब भी आरबीआई के चार प्रतिशत (दो प्रतिशत ऊपर नीचे की गुंजाइश) के लक्षित दायरे के भीतर है। उल्लेखनीय है कि रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष के लिए मुद्रास्फीति का अनुमान 4.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया है। साथ ही जीडीपी वृद्धि का अनुमान 6.9 प्रतिशत से घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है।
श्री अग्रवाल ने कहा कि बाजार अगले 12-15 महीनों में आरबीआई द्वारा महत्वपूर्ण दर वृद्धि की संभावना का मूल्यांकन कर रहा है। नीतिगत घोषणाओं के बाद 10 वर्षीय सरकारी प्रतिभूति की यील्ड में मामूली सुधार हुआ है और यह लगभग 6.96 प्रतिशत पर कारोबार कर रही है। अबैकस म्यूचुअल फंड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी वैभव चुघ के अनुसार, रेपो दर को स्थिर रखना अपेक्षित था। मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की इस बैठक में ब्याज दरों से अधिक नीतिगत दिशा पर फोकस रहा। दरों में हालांकि कोई बदलाव नहीं किया गया, लेकिन आरबीआई ने विदेशी पूंजी आकर्षित करने और लंबी अवधि की सरकारी प्रतिभूतियों तक पहुंच बढ़ाकर तथा एफपीआई सीमाओं में ढील देकर बॉन्ड बाजार को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाये हैं। कर संबंधी सहायक उपायों के साथ मिलकर ये कदम सरकारी उधारी में निवेश प्रवाह बढ़ाने और समग्र पूंजी प्रवाह को मजबूत करने में मदद कर सकते हैं।श्री चुघ ने कहा कि ये उपाय निश्चित आय और इक्विटी दोनों बाजारों के लिए सकारात्मक हो सकते हैं। इससे तरलता बढ़ेगी, बॉन्ड यील्ड स्थिर रहेगी और वित्तपोषण की स्थितियां बेहतर होंगी। पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण हालांकि आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, हालिया ईंधन मूल्य वृद्धि और कमजोर मानसून की आशंकाएं अभी भी जोखिम बनी हुई हैं।
अरण्य रियल एस्टेट्स फंड एडवाइजर्स के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी शरद मित्तल ने कहा कि आरबीआई का नीतिगत दरों को यथावत रखने का निर्णय चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिस्थितियों के बीच विकास और मुद्रास्फीति के बीच संतुलन बनाने की उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। रियल एस्टेट जैसे लंबे निवेश चक्र वाले क्षेत्रों के लिए नीतिगत स्थिरता अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने उम्मीद जतायी कि मजबूत मांग, अनुशासित आपूर्ति और परियोजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन के कारण आवासीय क्षेत्र घरेलू और संस्थागत दोनों प्रकार की पूंजी को आकर्षित करता रहेगा। श्री मित्तल ने कहा कि मौजूदा ब्याज दर वातावरण डेवलपर्स, घर खरीदने वालों और निवेशकों को निश्चिंतता प्रदान करता है तथा रियल एस्टेट मूल्य श्रृंखला में सतत विकास को संभव बनाता है।
कोटक सिक्योरिटीज में कॅमोडिटी एवं करेंसी रिसर्च हेड अनिंद्य बनर्जी ने इस नीति को ब्याज दर निर्णय के साथ एक ‘भुगतान संतुलन पैकेज’ की संज्ञा दी। उनके अनुसार, केंद्रीय बैंक ने संकेत दिया है कि ब्याज दर का उपयोग मुद्रास्फीति नियंत्रण के लिए किया जायेगा, जबकि रुपये को बचाने के उपाय पूंजी खाते के माध्यम से किये जायेंगे। उन्होंने कहा कि विदेशी पूंजी आकर्षित करने के रिजर्व बैंक के उपाय 2013 के बाद का सबसे व्यापक प्रयास है। साथ ही, केंद्र सरकार द्वारा विदेशी निवेशकों के लिए सरकारी प्रतिभूतियों पर कर हटाना एक महत्वपूर्ण सहायक कदम है। उन्होंने कहा कि मुद्रा बाजार में, यदि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे रहती हैं, तो ये उपाय निकट अवधि में रुपये को मजबूत करने में मदद कर सकते हैं।

