नरोत्तम चुनावी मोड में, राज्यसभा उम्मीदवारी का विकल्प भी खुला


ग्वालियर चंबल डायरी

हरीश दुबे
दतिया में नरोत्तम मिश्रा अब पूरी तरह चुनावी मोड में हैं। पिछले हफ्ते भर में वे दर्जन भर से ज्यादा सभाएं, सम्मेलन और रणनीतिक बैठकें कर चुके हैं। कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ताओं को तोड़कर भाजपा में लाने का सिलसिला जारी है। स्थानीय स्तर पर पार्टी उन्हें प्रत्याशी मानकर चल रही है। हालांकि 23 की हार के बाद से ही अपने राजनीतिक पुनर्वास का इंतजार कर रहे नरोत्तम के समक्ष 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए दावेदारी जताने का विकल्प खुला हुआ है।

नरोत्तम राज्यसभा के बजाए विधानसभा वापसी में ज्यादा रुचि दिखा रहे हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि विधानसभा उपचुनाव में सफलता मिली तो मंत्री बनने का रास्ता खुला हुआ है। उधर कांग्रेस अभी तक उभर कर आईं अवधेश नायक, घनश्याम सिंह और राजेन्द्र भारती के बेटे की दावेदारियों में से अपने लिए मुफीद चेहरे का चयन नहीं कर पा रही है, हालांकि दतिया और सेवढा, दोनों सीटों से विधायक रह चुके दतिया राजपरिवार के घनश्याम सिंह ने खुद को टिकट की स्पर्धा से अब अलग कर लिया है।

बौद्ध सम्मेलन को लेकर प्रशासन अलर्ट, अम्बेडकर के पौत्र आ रहे हाईकोर्ट परिसर में बाबा अंबेडकर की प्रतिमा लगाए जाने को लेकर दलित और सवर्ण समाज से जुड़े संगठनों के टकराव को जिला प्रशासन के सख्त तेवर किसी तरह थामे हुए हैं लेकिन इस छह जून को शहर में बाबा साहब के पौत्र सहित कई बड़े दलित नेताओं के आगमन और इसी दिन दतिया के बिलहारी ग्राम में बड़े स्तर पर आयोजित हो रहे बौद्ध सम्मेलन को लेकर प्रशासन अलर्ट मोड पर है। दरअसल, बाबा साहब ने पांचवे दशक में जिस बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया की स्थापना की थी, उसी का यहां जलसा हो रहा है। हाईकोर्ट में अम्बेडकर प्रतिमा लगाने या न लगाने के मुद्दे पर पहले से ही शहर की सामाजिक फ़िजाँ में तनाव घुला है, लिहाजा ग्वालियर में बौद्ध समाज के इतने बड़े जलसे को लेकर प्रशासन फूंक फूंक कर कदम रख रहा है। वैसे आयोजकों ने प्रशासन को यह कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण और सामाजिक सद्भाव पर केंद्रित रहने का भरोसा दिया है। ग्वालियर और दतिया, दोनों जिलों का प्रशासन अपने तईं कमर कसकर तैयार है।
शहर के सबसे बड़े मंदिर में अब प्रबंधन के खिलाफ खेमेबंदी
शहर के सबसे प्रतिष्ठित और सर्वाधिक भीड़ भरे मंदिर अचलेश्वर का परिसर न्यास के कुछ सदस्यों की नाराजगी के चलते गर्माया हुआ है। जिला प्रशासन ने मंदिर की व्यवस्थाओं को मैनेज करने के लिए रिसीवर के साथ ही सात सदस्यीय कमेटी मुकर्रर कर रखी है। इसी के कामकाज पर सवाल उठ रहे हैं। मंदिर में पुरानी जीर्ण शीर्ण प्याऊ की जगह अत्याधुनिक हाईटेक प्याऊ के निर्माण के साथ ही वाटर हार्वेस्टिंग, दीपदान, पादुका स्थली एवं पार्किंग जैसे विभिन्न मुद्दों पर न्यास सदस्यों और श्रद्धालुओं का गुस्सा भड़क उठा। हंगामा इस हद तक बढ़ा कि विधायक सतीश सिकरवार के दखल के बाद ही मामला शांत हुआ।

श्रद्धालुओं को सभी मांगें माने जाने का भरोसा मिला है। लेकिन अब फिर से मंदिर परिसर गर्माया हुआ है, वजह यह कि न्यास के आदित्य शर्मा ने सीधे कलेक्ट्रेट में लिखित आवेदन देकर न्यास का बायलॉज के निर्माण व साधारण सभा की बैठक बुलाने की मांग कर डाली है। आरोप लगे हैं कि मंदिर के इंतजामों के लिए 7 सदस्यों की जो समिति बनाई थी, उसकी आज तक कोई बैठक ही आयोजित नही हुई और न मंदिर प्रांगण मे चल रहे जीर्णोद्धार के लिये कोई टेंडर प्रकिया का पालन किया गया। वैसे यह सच है कि मंदिर के प्रमुख आयोजन महाशिवरात्रि, वसंत पंचमी पर होने वाले सामूहिक विवाह सम्मेलन, अन्नकूट, शरद पूर्णिमा आदि के आयोजनो की चमक भी पहले से फीकी पड़ी है।
निर्दलीय लड़ने की स्थिति में प्रवीण के लिए आसान नहीं चुनावी डगर
ग्वालियर चंबल अंचल में व्यापारियों, उद्यमियों के सबसे बड़े संगठन मप्र चैम्बर ऑफ कॉमर्स के चुनाव में व्यापारी वर्ग की निगाहें मौजूदा अध्यक्ष डॉ. प्रवीण अग्रवाल पर टिकी हैं। भले ही व्हाइट हाउस ने उनका टिकट काटकर सराफा कारोबारी पारस जैन को अध्यक्ष पद के लिए मैदान में उतार दिया है लेकिन व्यापारी वर्ग का मानना है कि प्रवीण चुनावी समीकरणों में बड़ा उलटफेर करने की क्षमता रखते हैं। ज्यादा संभावना इसी बात की है कि प्रवीण हाउसों की राजनीति छोड़ निर्दलीय ताल ठोकेंगे। यदि ऐसा हुआ तो व्हाइट हाउस के समक्ष बड़ा संकट खड़ा हो सकता है और व्हाइट के प्रत्याशी पारस के लिए चुनावी वैतरणी पार करना मुश्किल हो जाएगा।

लेकिन प्रवीण अग्रवाल भले ही सर्वाधिक पढ़े लिखे व्यापारी प्रतिनिधि होने के साथ ही लोकप्रियता के पैमाने पर व्यापारी तबके में गहरी पैठ रखते हैं लेकिन निर्दलीय लड़ने की स्थिति में उनका मुकाबला व्हाइट और क्रिएटिव, दोनों हाउसों के उम्मीदवारों से होगा, इस लिहाज से प्रवीण अग्रवाल की चुनावी डगर भी उतनी आसान नहीं कही जा सकती। बड़ा उलटफेर यह हुआ है कि अब तक व्हाइट हाउस के संरक्षक की भूमिका निभाने वाले डॉ. वीरेन्द्र गंगवाल ने अपने को हाउसों की हदबंदी से दूर कर लिया है।

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