नयी दिल्ली, 30 मई (वार्ता) सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा है कि भविष्य के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को ऐसे तेजी से जटिल होते सुरक्षा माहौल में काम करने के लिए तैयार रहना होगा जहां प्रतिस्पर्धा और संघर्ष के बीच का अंतर धुंधला होता जा रहा है।
जनरल द्विवेदी ने शनिवार को देहरादून स्थित राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में 150वें कोर्स की पासिंग आउट परेड में कैडेटों को संबोधित करते हुए यह बात कही। सेना प्रमुख ने परेड का निरीक्षण करते हुए इस अवसर को ‘गौरवपूर्ण’ और ‘बेहद निजी’ क्षण बताया। उन्होंने याद किया कि करीब 42 साल पहले, एक युवा कैडेट के रूप में जब उन्होंने अपनी सैन्य यात्रा शुरू की थी तो वह भी इसी परेड ग्राउंड से गुज़रे थे।
उन्होंने कैडेटों से कहा, ” आज, जब मैं वर्दी वाली ज़िंदगी के अंतिम पड़ाव पर आपके सामने खड़ा हूं और अपनी वर्दी उतारने की तैयारी कर रहा हूं, जबकि आप अपनी वर्दी पहनने की तैयारी कर रहे हैं तो मैं पूरे यकीन के साथ कह सकता हूं कि यहां जो कुछ भी शुरू होता है, वह हमेशा आपके साथ रहता है।”
परेड कमांडर, पुरस्कार विजेताओं और सभी कैडेटों को बधाई देते हुए, सेना प्रमुख ने 12 मित्र देशों के विदेशी कैडेटों की भागीदारी की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि ये कैडेट अपने साथ अकादमी में सीखे गए मूल्यों और दोस्ती को लेकर जाएँगे। उन्होंने कहा, “आप अलग-अलग जगहों से आए थे, लेकिन यहां से आप इस सरज़मीं और इसके मूल्यों से ढलकर निकल रहे हैं।”
इस कोर्स में कुल 353 कैडेट पास होकर अधिकारी बनें जिनमें 18 महिला कैडेट और 12 देशों के विदेशी कैडेट शामिल हैं।
जनरल द्विवेदी ने पास होकर अधिकारी बनने वाले कैडेटों से कहा कि जिस दुनिया में वे कदम रख रहे हैं, वहां “परिचय की ज़रूरत नहीं पड़ती।” उन्होंने आगाह किया कि आधुनिक खतरे अब केवल वर्दी पहनकर या स्पष्ट रूप से परिभाषित युद्ध-मोर्चों पर ही नहीं आते।
सेना प्रमुख ने कहा, ” प्रतिस्पर्धा और संघर्ष के बीच की सीमा धुंधली हो गई है। आज के सुरक्षा माहौल की यह मांग है कि जो लोग देश की सेवा करते हैं, वे कार्रवाई करने के साथ-साथ अपनी सोच में भी उतनी ही तेज़ी और स्पष्टता रखें।”
‘ऑपरेशन सिंदूर’ का ज़िक्र करते हुए, सेना प्रमुख ने कहा कि इस ऑपरेशन ने यह दिखाया कि राष्ट्रीय शक्ति का इस्तेमाल कितनी “सटीकता और दृढ़ संकल्प” के साथ किया जा सकता है। साथ ही इस कार्रवाई ने उकसावे की स्थिति में भविष्य की सैन्य प्रतिक्रियाओं के लिए एक मानक (बेंचमार्क) भी स्थापित किया है।
उन्होंने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर ने यह साबित किया जब राष्ट्रीय इच्छाशक्ति को सटीकता और दृढ़ संकल्प के साथ व्यक्त किया जाता है, तो भारत उकसावे का जवाब किस तरह देता है।” उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन द्वारा स्थापित किए गए मानक अब सैन्य नेतृत्व की अगली पीढ़ी की ज़िम्मेदारी बन जाएंगे।
जनरल द्विवेदी ने सशस्त्र बलों के बीच आपसी तालमेल और एकीकरण के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह के सहयोग की नींव अकादमी में ही रखी जाती है।
उन्होंने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर में जो एकीकृत जवाबी कार्रवाई देखने को मिलीं, वे ठीक उसी तरह की नींव पर बनी थीं, जो अकादमी डालती है , यानी, एकता सिर्फ़ एक पढ़ा जाने वाला कॉन्सेप्ट नहीं, बल्कि एक जीती-जागती संस्कृति है।”
जनरल द्विवेदी ने कैडेटों को याद दिलाया कि भले ही वे अलग-अलग सेवाओं और टुकड़ियों में शामिल होंगे, लेकिन वर्दी का नज़रिया हमेशा राष्ट्रीय ही रहना चाहिए।
चार दशकों से ज़्यादा की सैन्य सेवा के अनुभव साझा करते हुए सेना प्रमुख ने लगातार सीखते रहने और बौद्धिक जिज्ञासा के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा ,” जिन बेहतरीन अधिकारियों से मैं मिला हूं, वे वो नहीं थे जिन्हें सबसे पहले सम्मान मिला। वे वो थे जो सबसे लंबे समय तक छात्र बने रहे, जो हर काम में यह पूछते हुए जाते थे कि ‘मुझे यहां क्या सीखना है? ‘ न कि यह कि ‘मुझे यहां क्या साबित करना है? ”
जनरल द्विवेदी ने भविष्य के सैन्य नेतृत्व को को आकार देने में रवैये, ढलने की क्षमता और योग्यता को बेहद महत्वपूर्ण करार दिया।
उन्होंने कहा, “यह याद रखना, रवैया तुम्हारा अंदरूनी सहारा है। ढलने की क्षमता का मतलब है, मुश्किलों के बीच भी अपने रास्ते पर डटे रहना और योग्यता सिर्फ़ हुनर से कहीं बढ़कर है यह भरोसा जगाने, सही फ़ैसले लेने और दबाव में भी शांत रहने की क्षमता देती है।” नेतृत्व पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि सच्चा नेतृत्व अधिकार से नहीं बल्कि भरोसे से हासिल होता है।
उन्होंने कहा, ” जब नेतृत्व सच्चा होता है, तो उसका ढिंढोरा नहीं पीटा जाता। उसे तुम्हारे साथ खड़े सैनिक चुपचाप पहचान लेते हैं। नेतृत्व इस तरह करो कि तुम्हारे सैनिक अपनी मर्ज़ी से तुम्हारा अनुसरण करें इसलिए नहीं कि उन्हें ऐसा करना ही है, बल्कि इसलिए कि उन्हें तुम पर भरोसा है।”
सेना प्रमुख ने अकादमी से पास होकर निकल रही महिला कैडेटों की भी तारीफ़ की और कहा कि उन्होंने हर मानक को पूरा किया है और प्रशिक्षण के हर पहलू में बेहतरीन प्रदर्शन किया है।
सेना प्रमुख ने कहा ,” वे हर टुकड़ी में खड़ी हुईं, हर मानक को पूरा किया, और आज इस परेड ग्राउंड पर, वे किसी भी दूसरे कैडेट से अलग नहीं दिखतीं। और यही तो असली बात है। आगे आने वाली लड़ाइयों में, साहस और पक्का इरादा किसी लिंग को नहीं देखता, लड़ाई हमेशा लिंग-निरपेक्ष होती है। ”
संबोधन के अंत में सेना प्रमुख ने पास होकर निकल रहे कैडेटों को अकादमी के आदर्श वाक्य—’सेवा परमो धर्म’ (सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है)—की याद दिलाई, और उनसे आग्रह किया कि वे अपने पूरे सैन्य करियर के दौरान हर फ़ैसले में इस आदर्श वाक्य को अपना मार्गदर्शक बनाए रखें।
उन्होंने कहा,”आप इस परेड ग्राउंड से ऐसे नहीं जा रहे कि आप मंज़िल पर पहुंच गए हो, बल्कि ऐसे जा रहे हैं कि आपने अभी शुरुआत की है। आगे बढ़ें, अच्छी सेवा करें। राष्ट्र आपसे इससे कम की उम्मीद नहीं करता।”
