खंडवा: कभी अनुशासन और संगठनात्मक मजबूती के लिए पहचान रखने वाली भाजपा अब अंदरूनी खींचतान और गुटबाजी के दौर से गुजरती दिखाई दे रही है। संगठन और सत्ता के बीच बढ़ती दूरी अब सार्वजनिक मंचों और प्रशासनिक फैसलों में भी साफ नजर आने लगी है। जिला पंचायत अध्यक्ष पिंकी वानखेड़े की पार्टी बैठक में खुलकर सामने आई नाराजगी के बाद अब विधायक कंचन तनवे के वायरल पत्र ने जिले की राजनीति में नया भूचाल ला दिया है।राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि खंडवा में भाजपा के भीतर चल रही आपसी खींचतान का असर विकास कार्यों पर भी दिखाई देने लगा है। नगर निगम के करीब 1 करोड़ 5 लाख रुपए से अधिक के विकास कार्य अचानक रोक दिए जाने की खबर ने इस चर्चा को और हवा दे दी है।
वायरल पत्र के बाद थमे विकास कार्य
सूत्रों के अनुसार जिन विकास कार्यों की टेंडर प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी और वर्क ऑर्डर जारी होने की तैयारी थी, उन्हें अचानक रोक दिया गया। इनमें इंदौर नाका प्रवेश द्वार निर्माण, सीसी रोड, बाउंड्रीवॉल तथा जिमखाना ग्राउंड से जुड़े कार्य शामिल बताए जा रहे हैं।इन कार्यों के रुकने के पीछे विधायक कंचन तनवे के उस पत्र को वजह माना जा रहा है, जो हाल ही में सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि आधिकारिक स्तर पर किसी विवाद से इनकार किया जा रहा है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे भाजपा के भीतर बढ़ते शक्ति संघर्ष से जोड़कर देख रहे हैं।
विधायक-महापौर समन्वय पर उठे सवाल
खंडवा की राजनीति में लंबे समय से विधायक कंचन तनवे और महापौर अमृता यादव के बीच समन्वय को लेकर चर्चाएं होती रही हैं। अब विकास कार्यों पर लगे ब्रेक ने इन चर्चाओं को और तेज कर दिया है।
राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि संगठन और सत्ता के अलग-अलग केंद्र बनने से कई जनप्रतिनिधि खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। यही कारण है कि नाराजगी अब बंद कमरों से निकलकर सार्वजनिक मंचों तक पहुंच रही है। जिसकी सुगबुगाहट प्रदेश नेतृत्व तक पहुंच गई है यही कारण है शुक्रवार को निमाड़ संभाग प्रभारी सुरेंद्र शर्मा और सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल की मीडिया के सामने सफाई पेश करनी पड़ी।
तीन धड़ों में बंटी नजर आ रही भाजपा:
जिले की भाजपा वर्तमान में स्पष्ट रूप से कई गुटों में बंटी दिखाई दे रही है। एक धड़ा वर्तमान नेतृत्व और सत्ता केंद्र के साथ खड़ा नजर आता है, जबकि दूसरा धड़ा लंबे समय से संगठन में सक्रिय रहे वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं का बताया जा रहा है। तीसरा वर्ग उन कार्यकर्ताओं का है जो मौजूदा हालात में खुद को असमंजस की स्थिति में महसूस कर रहे हैं। वरिष्ठ नेताओं की कार्यक्रमों से दूरी और कई जनप्रतिनिधियों की सार्वजनिक नाराजगी अब संगठन के भीतर बढ़ती संवादहीनता की ओर इशारा कर रही है।
नंदू भैया की कमी और संवादहीनता की खाई :
आज के इस सियासी घमासान में हर कार्यकर्ता को स्वर्गीय नंदकुमार सिंह चौहान (नंदू भैया) की कमी शिद्दत से खल रही है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि नंदू भैया के पास वह “राजनीतिक दक्षता” थी जिससे वे सबको साध लेते थे। आज की लीडरशिप में ‘संवाद’ की जगह ‘आदेश’ ने ले ली है। जिस तरह जिला महामंत्री द्वारा जिला पंचायत अध्यक्ष को सूचना न देना और उसे विधायक से जुड़ी आपसी अनबन का नतीजा माना जाना, यह दर्शाता है कि संगठन अब व्यक्तिगत अहंकार की भेंट चढ़ रहा है।
यही कारण है कि जिले में भाजपा तेजी से उसी गुटबाजी की राह पर चल पड़ी है, जिसका वह कभी कांग्रेस में होने पर मजाक उड़ाया करती थी। कार्यक्रमों में भीड़ तो जुट रही है, लेकिन कार्यकर्ताओं का ‘भाव’ और ‘समर्पण’ गायब है। वरिष्ठों का ‘मौन विरोध’ और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की सार्वजनिक नाराजगी यह बताने के लिए काफी है कि खंडवा भाजपा में अब सबकुछ ठीक नहीं है।
बहरहाल भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच स्वर्गीय नंदकुमार सिंह चौहान की राजनीतिक शैली की चर्चा फिर तेज हो गई है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि उनके समय में संगठन में संवाद, समन्वय और सामंजस्य की स्थिति बनी रहती थी। मौजूदा हालात में कई कार्यकर्ता खुद को निर्णय प्रक्रिया से अलग महसूस कर रहे हैं।
सांसद को करना पड़ा बचाव :
मामले को लेकर सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल को भी सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी। संगठन और जनप्रतिनिधियों की ओर से लगातार यह कहा जा रहा है कि विधायक और महापौर के बीच किसी प्रकार का विवाद नहीं है, लेकिन वायरल पत्र और रुके हुए विकास कार्यों ने राजनीतिक अटकलों को और मजबूत कर दिया है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते संगठन के भीतर बढ़ रही नाराजगी, संवादहीनता और गुटबाजी को नियंत्रित नहीं किया गया, तो इसका असर आने वाले चुनावों में दिखाई दे सकता है।
खंडवा भाजपा फिलहाल ऐसे दौर से गुजरती दिख रही है, जहां सत्ता, संगठन और जनप्रतिनिधियों के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
