दिवाला संहिता के 10 साल पूरे , समाधान प्रक्रिया से कर्जदाताओं को चार लाख करोड़ रुपये की रकम दिलाने में मदद मिली

नयी दिल्ली, 29 मई (वार्ता) ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवाला संहित (आईबीसी) के लागू होने के बाद से भारत में ऋण भुगतान संस्कृति में सुधार हुआ है और ऋण समाधान प्रक्रिया के जरिये कर्जदाताओं की चार लाख करोड़ रुपये से अधिक की रकम वापस कराने में मदद मिली है।

वर्ष 2016 में लागू आईबीसी के शुक्रवार को 10 साल पूरे कर चुके हैं। कार्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने यहां एक विज्ञप्ति में कहा है कि यह संहिता कानून में केवल सुधार मात्र नहीं है बल्कि इससे दस साल में ऋण बाजार, कंपनियों के व्यवहार, निवेशकों में भरोसे और अर्थव्यवस्था की कुशलता में दूरगामी सकारात्मक असर हुआ है। इसे लागू करने से कर्ज के समाधा का स्वरूप सुधरा है, उधार लेने वालों में दायित्व बोध बढ़ा है, और वित्तीय तथा कानूनी व्यवस्था में विश्वास बढ़ा है।’

विज्ञप्ति के अनुसार मार्च 2026 तक, 1419 मामलों में समाधान योजना मिली और इससे चार लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की वसूली हुई है। विज्ञप्ति में कहा गया है कि कर्जदाताओं (बैंकों, वित्तीय संस्थानों आदि वित्तीय कर्जदताओं) की इस प्रक्रिया से वसूल हुई रकम कर्ज-सम्पत्ति के उचित मूल्य और परिसमापन मूल्य के मुकाबले क्रमशः 95 प्रतिशतऔर 167 प्रतिशत है।

मार्च 2026 तक ऋण समाधान के कुल 8,987 माले एनसीएलटी में दाखिल हुए थे जिनमें से 7,102 का निपटारा हो गया था। इन निपट गये मामलों में 58 प्रतिशत मामलों में ( 4,099 मामलों ) में कंपनियों का उद्धार करने में सफलता मिली जबकि 3,003 मामलों में बची खुची सम्पत्ति को बेच-बाच कर कंपनी को परिसमाप्त कर दिया गया। उद्धार किये गये मामलों से, 1,388 मामले अपील, समीक्षा या समाधान के कारण बंद कर दिये गये गए जब 1,292 वापस ले लिए गए।

जिन मामलों में समाधान योजना बनी, उनमें से करीब 42 प्रतिशत पहले औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड के पास थे या बंद हो चुके थे। यह दर्शाता है कि आईबीसी कर्ज में डूबी कंपनियों को फिर से खड़ा करने में सहायक हो सकता है।

कर्ज चुकाने में ढिलाई करनी वालों पर आईबीसी का डर कितना है वह इस बात से साफ़ है कि राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में दर्ज कराये गये 30,000 से ज़्यादा मामले दाखिला मिलने से पहले ही सुलझा लिये गये और वापस ले लिये गए। ऐसे मामलों में लगभग 14 लाख करोड़ रुपये की बकाया रकम जुड़ी थी। यह कर्जदता-कर्जदार के बीच संबंधों पर इस संहिता के परिर्वनकारी प्रभाव को दर्शाता है।

इससे बैंकों का सकल अवरुद्ध ऋण (ग्रास एनपीए) सितंबर 2025 में उनके कुल कर्ज के 2.1 प्रतिशत पर आ गया जो 2017 में यह लगभग 11.8 प्रतिशतथा। इसके चलते वैश्विक रेटिंग एजेंसी एस एंड पी ने भारत के दिवाला कानून को ‘ग्रुप सी’ से उठा कर ‘ग्रुप बी’ में कर दिया है।

इन दस वर्षों में वसूली दर लगभग 15–20 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 30 प्रतिशत पर पहुंच गयी है जबकि ऋण समाधान का समय लगभग 6–8 साल से घटकर लगभग 2 साल हो गई है। बैंक ऑफ़ इंडिया की भारत में बैंकिंग प्रणाली के रुझान और प्रगति की 2024–25 रिपोर्ट में कहा गया हैकि अनुसूचित वाणिज्यि बैंकों द्वारा अलग-अलग चैनलों के ज़रिए की गई कुल 1.04 लाख करोड़ रुपये की वसूली में से, लगभग 54 हराजर करोड़ रुपये (लगभग 52.4 प्रतिशत) आईबीसी प्रक्रिया के ज़रिए हासिल की गयी।

आईआईएम बैंगलोर की एक अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि इस संहिता से कर्ज बाजार के व्यवहार में सुधार हुआ है। 2018 और 2024 के ‘लंबित बकाया ‘ श्रेणी के कार्जों के ‘सामान्य श्रेणी ‘के खातों में परिवर्तित होने का अनुपात बढा है। कर्ज के भुगतान में देरी औसत 248-344 दिन से घटकर 30-87 दिन पर आ गयी है।

मंत्रालय का कहना है कि आईबीसी के अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव का असर इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके जरिये जिन कंपनियों के कर्ज का समाधान हुआ है उनकी औसत बिक्री लगभग 89 प्रतिशतबढ़ी है तथा एसेट-टर्नओवर (परिसम्पत्ति-कारोबार) अनुपात में लगभग 131 प्रतिशत का सुधार हुआहै। इस प्रक्रिया से उबरी इकाइयों में पांच सालों में पूंजीगत व्यय औसतनलगभग 106 प्रतिशत बढ़ा, जो नए निवेश और आर्थिक रूप से फायदेमंद होने को दिखाता है।

 

 

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