भारत यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते को अब व्यवहार के धरातल पर उतारने की चुनौती: वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय

नई दिल्ली, (वार्ता) वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने कहा है कि यूरोपीय संघ और भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) का सम्पन्न होना यदि “आर्थिक कूटनीति का एक दुर्लभ क्षण” था तो उसे भारतीय निर्यातकों, निवेशकों और रोज़गार पैदा करने वालों के लिए फ़ायदे मंद व्यवस्था में बदलना एक पहाड़ चढने के समान है।

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव दर्पण जैन ने उद्योग मंडल फिक्की और सेंटर फॉर ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट लॉ के सहयोग से भारत -ईयू एफटीए से लाभ उठाने के विषय पर आयोजित सम्मेलन को संबोधित करते हुए यह बात कही। उन्होंने कहा, “हमने बातचीत का पहाड़ चढ़ लिया है, अब इससे भी बड़ी चढ़ाई शुरू होती है — इसे भारत और यूरोप भर में हर निर्यातक, हर निवेशक और हर रोज़गार पैदा करने वाले के लिए ज़मीनी स्तर पर कारगर बनाना है।”

श्री जैन इस समझौते के संबंध में भारत के मुख्य वार्ताकार हैं। इस समझौते की घोषणा गत जनवरी में की गयी थी। इसके तहत भारत के लगभग 99.5 प्रतिशत निर्यात को यूरोपीय संघ के बार में कम या शून्य शुल्क पर प्रवेश का लाभ मिलेगा। भारत से कपड़े, वस्त्र, चमड़ा, जूते और रत्न व आभूषणों पर यूरोप में शुल्क की पूर्व समाप्ति का लाभ मिलेगा जबकि इन पर वर्तमान में वहां 10-14 प्रतिशत (और कुछ श्रेणियों में 26 प्रतिशत तक) उच्च शुल्क लगता है। भारत ऐसे 33 अरब डॉलर मूल्य के श्रम-प्रधान सामान का यूरोपीय संघ के बाजार में निर्यात करता है।

उन्होंने बताया कि भारत और ईयू का संयुक्त आयात, वस्तुओं और सेवाओं के वैश्विक व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा है — यह एक ऐसा पैमाना है “जो कोई अन्य समझौता वास्तव में प्रदान नहीं कर सकता।”

सेंटर फॉर ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट लॉ के प्रोफेसर और प्रमुख, तथा विश्व व्यापार संगठन (डब्यूटीओ) की पीठ के कार्यक्रमों के तहत भारत के प्रतिनिधि (भारतीय पीठ) के प्रमुख जेम्स नेदुम्पारा ने कहा कि यह फ़ैसला ऐसे समय में लिया गया है जब बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से जुड़ी अपनी प्रतिबद्धताओं को “पूरी तरह से नज़रअंदाज़” कर रही थीं। ऐसे में, भारत और के 27 सदस्य देशों के यूरोपीय संघ के बाज़ार खोलने की अपनी प्रतिबद्धताओं को और गहरा करने का निर्णय, नियमों पर आधारित व्यापार की एक महत्वपूर्ण पुष्टि है। उन्होंने आगे कहा कि यह समझौता “सिर्फ़ व्यापार के बारे में नहीं है , बल्कि इस बारे में है कि हम व्यापार कैसे करते हैं।”

फिक्की के महासचिव अनंत स्वरूप ने कहा कि भारत के कुल वस्तु व्यापार में अकेले ईयू की हिस्सेदारी लगभग 12 प्रतिशत है। उन्होंने कहा, “हमारे सामने चुनौती यह है कि हम इन समझौतों को उद्योग जगत विशेष रूप से निर्यातकों, एमएसएमई और सेवा प्रदाताओं के लिए ठोस लाभों में बदल सकें।”

फिक्की की महानिदेशक ज्योति विज ने कहा कि इस समझौते का वास्तविक महत्व इस बात से तय होगा कि उद्योग जगत इसे किस हद तक अपनाता है। उन्होंने कहा, “इन समझौतों की असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारतीय उद्योग इन्हें कितनी प्रभावी ढंग से अपनाता है और इनका उपयोग करता है।”

फिक्की की विदेश व्यापार और व्यापार सुगमीकरण समिति के अध्यक्ष तथा शाही एक्सपोर्ट्स के प्रबंध निदेशक हरीश आहूजा ने व्यापार को मज़बूत बनाने वाली सहायक प्रणालियों जैसे कि मानक-संबंधी बुनियादी ढाँचा, परीक्षण और प्रमाणन क्षमताएँ, निर्यातकों के बीच जागरूकता, डिजिटल अनुपालन उपकरण, और गैर-शुल्क बाधाओं को तेज़ी तथा कुशलता से दूर करने के लिए आवश्यक तंत्र को और अधिक सुदृढ़ बनाने का आह्वान किया।

 

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