
ग्वालियर। जीवाजी विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग ने एक बार फिर राष्ट्रीय फलक पर अपनी अकादमिक श्रेष्ठता का लोहा मनवाया है। देश के दो सबसे बड़े और संवेदनशील धार्मिक- ऐतिहासिक स्थलों अयोध्या के राम मंदिर और धार की भोजशाला का वैज्ञानिक सच सामने लाने में यहाँ के पुरातत्वविदों की भूमिका निर्णायक रही है। हाल ही में धार भोजशाला को लेकर न्यायालय द्वारा सुनाया गया निर्णय इसी विभाग के पूर्व छात्र और एएसआई के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक प्रो. आलोक त्रिपाठी द्वारा प्रस्तुत विस्तृत शोध रिपोर्ट पर आधारित है।
ग्वालियर के ‘मामा का बाजार’ क्षेत्र के निवासी प्रो. आलोक त्रिपाठी ने अपनी टीम के साथ मार्च से जुलाई 2024 के बीच भोजशाला का सूक्ष्म पुरातात्विक निरीक्षण किया था। प्रो. त्रिपाठी ने 10 खंडों में बंटी हुई कुल 2200 पेज की एक व्यापक रिपोर्ट न्यायालय को सौंपी थी। 98 दिनों तक चले इस शोध में स्पष्ट हुआ कि 10वीं शताब्दी में राजा भोज द्वारा निर्मित इस मूल संरचना के स्वरूप में 13वीं-14वीं शताब्दी के दौरान परिवर्तन किए गए थे। प्रो. त्रिपाठी, जिन्होंने 1984-86 के दौरान जीवाजी विश्वविद्यालय से पुरातत्व में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की थी, अपनी इस सफलता का श्रेय विश्वविद्यालय में मिली उत्कृष्ट शिक्षा और वरिष्ठ प्रोफेसरों के मार्गदर्शन को देते हैं।
विश्वविद्यालय का यह गौरवशाली इतिहास दशकों पुराना है। अयोध्या में राम मंदिर की मौजूदगी के पुरातात्विक साक्ष्य सबसे पहले दुनिया के सामने लाने का श्रेय जीवाजी विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के प्रथम विभागाध्यक्ष प्रो. बीबी लाल को जाता है। 1970 के दशक में उन्होंने ‘आर्कियोलॉजी ऑफ रामायण साइट्स’ प्रोजेक्ट के तहत खुदाई का नेतृत्व किया था। इस दौरान उन्हें बाबरी ढांचे के नीचे ऐसे पत्थर के खंभे मिले थे, जिन पर हिंदू देवी-देवताओं की आकृतियां अंकित थीं। प्रो. लाल के इन्हीं वैज्ञानिक तथ्यों को सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम फैसले में सबसे महत्वपूर्ण आधार माना था।
*जेयू परिसर में ‘श्रीराम पीठ’ की स्थापना*
मंदिर का सच उजागर करने में प्रो. बीबी लाल के अद्वितीय योगदान को देखते हुए जीवाजी विश्वविद्यालय ने परिसर में ‘श्रीराम पीठ’ का गठन किया है, जहाँ भगवान श्रीराम के कालखंड और उनके आदर्शों पर निरंतर शोध और अध्यापन कार्य किया जाएगा। वर्तमान विभागाध्यक्ष प्रो. शांतिदेव सिसौदिया का कहना है कि यह विश्वविद्यालय के लिए गर्व का क्षण है कि यहाँ के शिक्षक और छात्र देश की दिशा तय करने वाली ऐतिहासिक रिपोर्टों का हिस्सा रहे हैं। ग्वालियर के लिए भी यह गौरव की बात है कि यहाँ के विशेषज्ञों ने प्राचीन भारतीय इतिहास के बंद पन्नों को वैज्ञानिक तर्कों के साथ दुनिया के सामने रखा है।
