जिला चिकित्सालय सह ट्रामा सेंटर की साफ-सफाई व्यवस्था फिर चरमराई

सिंगरौली : जिला चिकित्सालय सह ट्रामा सेंटर बैढ़न की साफ-सफाई व्यवस्था फिर से चरमराने लगी है। कलेक्टर के कड़े फटकार के बावजूद संविदाकार पर असर नही पड़ रहा है। आलम यह है कि पूरा अस्पताल परिसर कचरे के चलते बदबू मार रहा है।दरअसल यहां बताते चले कि पिछले सप्ताह सिंगरौली विधायक रामनिवास शाह एवं पिछले पखवाड़ा कलेक्टर गौरव बैनल ने जिला चिकित्सालय सह ट्रामा सेंटर का औचक निरीक्षण करते हुये लचर साफ-सफाई व्यवस्था को लेकर सिविल सर्जन के साथ-साथ कलेक्टर ने संविदाकार को भी जमकर फटकार लगाया।

वहीं विधायक ने भी अस्पताल की व्यवस्था बेहतर रखने एवं साफ-सफाई पर जोर देते हुये कहा था कि मरीजो को बेहतर से बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हो। आलम यह है कि कल शाम करीब 5:30 बजे नवभारत की टीम जिला चिकित्सालय सह ट्रामा सेंटर पहुंची तो, वहां बदबू ही बदबू नजर आ रहा है। जगह-जगह कचरे पड़े हुये दिखे। यहां के कई मरीजो ने बताया कि साफ-सफाई व्यवस्था इन दिनों बिलकुल ठीक नही है। सफाई के नाम पर महज खानापूर्ति की जा रही है। जिसके चलते पूरा अस्पताल परिसर दुर्गंध मार रहा है। मरीजो ने इस ओर विधायक एवं कलेक्टर का ध्यान आकृष्ट कराया है।
जिला चिकित्सालय में फर्स पर मरीज
जिला चिकित्सालय सह ट्रामा सेंटर के फीमेल वार्ड नम्बर 3 में मरीजो की बाढ़ आई है। आलम यह है कि जिला चिकित्सालय में मरीजो को पर्याप्त बेड न मिलने पर फर्स पर ही इलाज किया जा रहा है। आज ऐसा ही नजारा दिखाई दिया, जहां दो-तीन की संख्या में मरीज फर्स पर ही लेटे हुये थे। बताया जाता है कि उक्त वार्ड में मरीजों की संख्या ज्यादा होने के कारण बेड की संख्या कम होने के चलते फर्स पर इलाज किया है। हालांकि अन्य वार्डो में मरीजो की संख्या कम है और बेड भी खाली है। यहां बताते चले कि इन दिनों सबसे ज्यादा मरीज उल्टी दस्त, बुखार के ज्यादा संख्या में आ रहे हैं। प्रचंड गर्मी एवं हीट वेब का असर पूरे ऊर्जाधानी में है।
सिर्फ सार्थक लगाने आते हैं कई चिकित्सक
सार्थक के आधार पर ही स्वास्थ्य कर्मियों की पगार मिल रही है। सुबह ड्यूटी टाईम एवं वापस जाते समय यदि सार्थक लगा है, तभी उपस्थिति मानी जाएगी। अन्यथा यदि दिन में एक बार ही सार्थक लगा है तो उस दिन का वेतन कट सकती है। सूत्र बता रहे हैं कि कई चिकित्सक सुबह दो से ढाई घंटे ही ड्यूटी देते हैं और जैसे ही दोपहर के 12:30 बजने लगते हैं, चिकित्सक पीछे के दरवाजे से निकल जाते हैं और शाम के वक्त सिर्फ सार्थक लगाने आते हैं। इक्का-दुक्का ही चिकित्सक शाम के वक्त ओपीडी कक्ष में बैठे नजर आते हैं। चर्चा है कि अधिकांश चिकित्सक अपने क्लीनिक या नर्सिंग होम में चले जाते हैं। चर्चाएं यहां तक है कि इसीलिए के चलते इन दिनों मरीज अस्पताल में मरीज कम नजर आते हैं

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