भोपाल। चर्चित ट्विशा शर्मा सुसाइड मामले में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए मृतका की सास व पूर्व जज गिरिबाला सिंह और पति समर्थ सिंह के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है. जिसमें शुक्रवार को इस मामले में दोनों आरोपियों के वकील ने न्यायालय में जमानत के लिए याचिका दायर की थी. जिसकी सुनवाई दसवे अपर सत्र न्यायाधीश पल्लवी द्विवेदी के न्यायालय में की गई. जहां पर पूर्व जज गिरिबाला सिंह को जमानत मिल चुकी है वहीं बैठे समर्थ सिंह की जमानत पर सुनवाई सोमवार की जाएगी.
इस बात की जानकारी कटारा थाना प्रभारी सुनील दुबे ने दी. उन्होंने बताया कि आरोपी अभी फरार है. इस मामले की जांच के लिए पुलिस कमिश्नर ने एसआईटी गठित कर दी है. जिसमें छ: पुलिस अधिकारी शामिल किए गए है. ङ्क्षजनमें एसआईटी प्रमुख एसीपी रजनीश कश्यम, सब इंसपेक्टर सुनील दुबे, सब इंसपेक्टर वासुदेव सविता, सब इंसपेक्टर संजय दुबे दो अन्य सब इंसपेक्टर शामिल हैं. जो इस मामले की जांच करेंगे.
डेड बॉडी मर्चुरी में, नहीं हुआ अंतिम संस्कार
बताया जाता है कि मृतिका ट्विशा शर्मा के परिजनों ने आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग के चलते अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया था. जबकि मृतका का पोस्ट मार्टम गुरूवार को हो चुका था. उसके बाद भीअभी तक अंतिम संस्कार नहीं किया जा सका है.
मृतिका के परिजनों ने दहेज प्रताडऩा के लागाये हैं आरोप
कटारा हिल्स पुलिस ने रिटायर्ड जिला जज गिरीबाला सिंह और उनके बेटे समर्थ सिंह के खिलाफ हत्या और दहेज प्रताडऩा सहित विभिन्न गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया है। बता दें नोएडा की रहने वाली 31 वर्षीय ट्विशा शर्मा ने 12 मई की रात फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. जिसके बाद मृतका के भाई मेजर हर्षित शर्मा और परिजनों ने ससुराल पक्ष पर गंभीर आरोप लगाये, कि शादी के महज एक साल के भीतर ही ट्विशा को दहेज के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताडि़त किया जाने लगा था. उन्होंने ट्विशा के शरीर पर मिले चोट के नीले निशानों का हवाला देते हुए इसे हत्या करार दिया है और पति समर्थ पर सबूत मिटाने के आरोप भी लगाए हैं.
पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठाये सवाल
मामले में पुलिस की भूमिका पर भी शुरुआत में सवाल खड़े हुए थे. मृतका के परिजनों का आरोप था कि आरोपियों के रसूख के कारण पुलिस कार्रवाई करने से बच रही थी. परिजनों को एफआईआर दर्ज कराने के लिए थाने के बाहर रातभर प्रदर्शन करना पड़ा. हालांकि पुलिस का तर्क था कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और बयानों की जांच के बाद ही वैधानिक कार्रवाई की जा सकती थी.