
ग्वालियर चंबल डायरी हरीश दुबे। ग्वालियर निगम परिषद के चुनाव में बमुश्किल साल भर बाकी रह गया है। अगले साल जुलाई में मौजूदा परिषद का कार्यकाल पूरा हो जाएगा। इस हिसाब से जून के आखिर या जुलाई की शुरुआत में ही चुनाव करा लिए जाने की संभावना है। दोनों मुख्य प्रतिद्वंदी दलों भाजपा और कांग्रेस ने अभी से चुनाव के लिए कमर कस ली है। यही चुनाव मिशन 28 की दशा और दिशा तय करेंगे, लिहाजा शहर की राजनीति के अलंबरदारों ने इन चुनावों पर फोकस कर दिया है। हर वार्ड के लिए तीन नाम तैयार किए जा रहे हैं, एक जनरल कैटेगिरी से, दूसरा एससी रिजर्व और तीसरा महिला कोटे से। ताकि यदि कोई वार्ड महिला या एससी होता है तो ऐन वक्त पर प्रत्याशी ढूंढने में वक्त जाया न हो। दोनों दल इस तैयारी में हैं कि चुनाव के तीन महीने पहले ही संभावित उम्मीदवारों को इशारा कर दिया जाए ताकि उन्हें अपने जनाधार की रही सही कसर पूरा करने पर्याप्त समय मिल सके। इस बार भी पिछली बार की तरह नए चेहरे मैदान में आने की संभावना है। ऐसी सूरत में परिषद में युवा जोश तो दिखेगा लेकिन कामकाज में अनुभव की कमी नजर आएगी। पिछली मर्तबा ग्वालियर निगम के 66 वार्ड में से 55 वार्ड में जीतने वाले प्रत्याशी पहली बार पार्षद बने थे, जबकि 11 दूसरी या तीसरी बार पार्षद बनकर परिषद में पहुंचे, अर्थात मौजूदा परिषद युवा और फ्रेश थी, दोनों ही दलों की तमाम महिला नेत्रियां भी अभी से टिकट की स्पर्धा में शामिल हैं। पिछले चुनाव में 66 वार्ड में 35 महिला प्रत्याशियों ने भी जीत दर्ज कर परिषद में पचास प्रतिशत से ज्यादा का आंकड़ा छुआ था। वैसे 2014 के चुनाव में भी 49 सीट पर नए चेहरे जीतकर आए थे। मौजूदा परिषद दो पावर सेंटरों में बटी है, महापौर कांग्रेस की हैं तो सभापति भाजपा के, नतीजन राजनीतिक रस्साकसी में जनहित के कई मसले अटके रहते हैं। इस बार दोनों दल इस कोशिश में हैं कि महापौर पद पर जीत के साथ ही परिषद में स्पष्ट बहुमत भी हासिल हो ताकि सभापति भी अपना बनवाकर पूरी परिषद पर वर्चस्व कायम किया जा सके।
निगम मंडलों पर फुलस्टॉप से इनकी आस हुई निराश
ग्वालियर की इमरती देवी और मुन्नालाल जैसे सिंधिया समर्थकों से लेकर मुरैना के गिर्राज दंडोतिया और भिंड के अरविंद, ओपीएस और रणबीर जैसे पूर्व विधायक निराश हैं। वजह यह कि पार्टी स्तर पर यह निर्णय अंतिम रूप से ले लिया है कि निगम, मंडलों और बोर्डों में अब नियुक्तियां नहीं होंगी। हालांकि इस फैसले को प्रधानमंत्री द्वारा प्रत्येक स्तर पर बिना वजह का खर्च घटाने के आह्वान से जोड़कर देखा जा रहा है लेकिन अंदरखाने खबर यह है कि गुटों और उपगुटों में बटी भाजपा में निगम मंडलों में बिठाए जाने वाले चेहरों के नाम पर एकराय नहीं बन पा रही थी, पार्टी में और ज्यादा असमंजस या मतभेद की नौबत आए, उसके बजाए पहले इन नियुक्तियों को पेंडिंग करने और फिर इस प्रक्रिया को विराम देना पार्टी हित में ज्यादा जरूरी समझा गया। ग्वालियर जिले की बात करें तो जिले के तीन प्राधिकरणों में गुजिस्ता महीने के आखिरी हफ्ते में सात नेताओं की नियुक्तियां हुई हैं, जिनमें एक एक प्राधिकरण में सिंधिया और नरेंद्र सिंह के समर्थकों को अध्यक्षी मिली तो तीसरा प्राधिकरण संघम शरणम् हो गया। इन प्राधिकरणों को कब्जाने के लिए बरसों से छत्रपों की गणेश परिक्रमा करते रहे दीगर दावेदारों को मन मसोस कर रह जाना पड़ा। रही बात निगम मंडलों की, तो सबसे ज्यादा बखेड़ा ग्वालियर चंबल अंचल में है जहां नरेंद्र सिंह और सिंधिया के खेमे एक दूसरे से ज्यादा ओहदे चाहते हैं, शायद यही वजह रही कि पार्टी को नियुक्तियों पर फुल स्टॉप लगाने के लिए मजबूर होना पड़ा। दावेदारों ने अपना ध्यान अब ढाई साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावों पर फोकस कर दिया है।
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अपनों के सितम ने बगावत के लिए किया मजबूर
उपनगर मुरार से पार्षद रह चुके देवेन्द्र पाठक करीब छह साल पहले महाराज के साथ आस्था जताते हुए कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए थे लेकिन मूल भाजपा तो दूर की बात, उनकी अपने ही खेमे में पटरी नहीं बैठ पाई और वे सिंधिया समर्थक पूर्व विधायक मुन्नालाल के सिर ठीकरा फोड़ भाजपा से अलग हो गए हैं। सत्तारूढ़ दल में उनके इस्तीफे से हलचल है, वजह यह कि उन्होंने कमल दल के शहर सदर को भी निशाने पर लिया है। पाठक इस बात से खफा हैं कि शहर सदर का रवैया उनके प्रति पॉजिटिव नहीं रहा, तो क्या वे अब अपने पुराने दल में वापसी करेंगे या फिर उन्हें मना लिया जाएगा !
समीक्षा को क्षमा नहीं कर पा रहे नारायण
समीक्षा गुप्ता के नाम पर मंत्री नारायण सिंह ऐसे हठ पकड़ कर बैठे कि बड़े नेताओं के दखल पर भी नहीं पसीजे। मेयर रह चुकीं समीक्षा का नाम महिला आयोग की उपाध्यक्ष पद के लिए फाइनल होने के बाद आदेश भी टाइप हो चुका था लेकिन इससे पहले कि आदेश जारी होता, नारायण सिंह की नाराजगी ने नियुक्ति रुकवा दी। इस दौरान समीक्षा दिल्ली और भोपाल में डटी रहीं, सिंधिया से लेकर कई बड़े नेताओं से उन्होंने अपना दर्द साझा किया। इन नेताओं ने नारायण सिंह से नरमाई बरतने को कहा लेकिन चौथी बार चुनाव जीतकर मंत्री बने नारायण सिंह 2018 की हार को भुलाने के लिए तैयार नहीं हुए, वे अपने राजनीतिक जीवन की इस इकलौती हार का कसूरवार समीक्षा गुप्ता की बगावत को मानते हैं। फिलहाल तो नारायण ही भारी पड़े हैं। महिला आयोग का नियुक्ति आदेश जारी हो गया है। अध्यक्ष पद पर रेखा यादव और सदस्य के रूप में साधना स्थापक के नाम तो हैं लेकिन उपाध्यक्ष का नाम गायब है।
