नयी दिल्ली, 08 मई (वार्ता) नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) ने ‘भारत में अपराध 2024’ और ‘आकस्मिक मृत्यु और आत्महत्या 2024’ (एडीएसआई 2024) की विस्तृत रिपोर्ट जारी कर दी है।
वर्ष 2024 के कैलेंडर डाटा पर आधारित यह रिपोर्ट देश की कानून-व्यवस्था की मिश्रित तस्वीर पेश करती है। जहां एक ओर महिलाओं, दलितों (एससी) और आदिवासियों (एसटी) के खिलाफ होने वाले अपराधों में कमी दर्ज की गयी है, वहीं साइबर फ्रॉड और बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन शोषण के आंकड़ों ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, देश में कुल संज्ञेय अपराधों में छह प्रतिशत की गिरावट देखी गयी है। साल 2023 में जहां 62.41 लाख मामले दर्ज हुए थे, वहीं 2024 में यह संख्या घटकर 58.86 लाख रह गयी है। प्रति लाख जनसंख्या पर अपराध दर भी 448.3 से घटकर 418.9 हो गयी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) जैसे नये कानूनों के लागू होने के बाद ‘हर्ट’ के मामलों की रिपोर्टिंग और वर्गीकरण में आये बदलाव के कारण इन मामलों में 30 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की गयी है। इसकी बड़ी वजह यह है कि पहले आईपीसी की कई धाराओं के तहत छोटे-मोटे झगड़ों को भी ‘हर्ट’ में दर्ज कर लिया जाता था, लेकिन बीएनएस की परिभाषाओं और धाराओं के वर्गीकरण में बदलाव किया गया है। अब कई मामलों को ‘हर्ट’ के बजाय अन्य श्रेणियों में डाला जा रहा है या रिपोर्टिंग के तरीके बदल गये हैं। देश के लिए सबसे दुखद पहलू बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध हैं। पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज मामलों में चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में 5.9 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गयी है। साल 2024 में बच्चों के खिलाफ अपराध के कुल 1,87,702 मामले दर्ज किये गये। इनमें से 69,191 मामले पॉक्सो एक्ट के थे यानी बच्चों के खिलाफ हुए कुल अपराध का 37 फीसदी। इसके साथ ही लापता बच्चों के मामलों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गयी है।
महिलाओं के खिलाफ अपराधों में 1.5 प्रतिशत की मामूली कमी आयी है (कुल 4.41 लाख मामले), लेकिन पति या रिश्तेदारों की ओर से की जाने वाली ‘क्रूरता’ के मामले अब भी इस श्रेणी में सबसे ऊपर हैं। छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में गोवा और चंडीगढ़ में ‘बलात्कार दर’ (प्रति लाख महिला जनसंख्या पर बलात्कार के मामले) राष्ट्रीय औसत से अधिक पाये गये हैं। एडीएसआई रिपोर्ट के आंकड़े देश की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। साल 2024 में कुल 1,70,746 लोगों ने आत्महत्या की। इस संकट का सबसे ज्यादा असर दैनिक मजदूरों, किसानों, बेरोजगार युवाओं और गृहिणियों पर देखा गया है। शहरों की बात करें तो देश की राजधानी दिल्ली आत्महत्या के मामलों में सबसे ऊपर है। इसके बाद बेंगलुरु का नंबर आता है। इसके अलावा, ड्रग ओवरडोज से होने वाली मौतों में लगभग 50 प्रतिशत का उछाल आया है, जिससे तमिलनाडु और पंजाब जैसे राज्य सबसे अधिक प्रभावित हैं।
डिजिटल इंडिया के दौर में साइबर अपराध सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। साइबर क्राइम के मामलों में 17-18 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई है, जो 86,420 से बढ़कर 1,01,928 तक पहुंच गये हैं। इनमें से 72.6 प्रतिशत मामले ऑनलाइन फ्रॉड से संबंधित हैं। राज्यों में तेलंगाना (27,230 मामले) साइबर अपराधों का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है, जिसके बाद कर्नाटक का स्थान है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य ने अपनी अपराध दर को राष्ट्रीय औसत से कम रखकर सुधार दिखाया है। हालांकि आर्थिक अपराधों के ग्राफ में देश भर में 4.6 प्रतिशत की वृद्धि देखी गयी है। दलितों (एससी) के खिलाफ अपराधों में 3.6 प्रतिशत और आदिवासियों (एसटी) के खिलाफ अपराधों में 23 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की गयी है, जो सामाजिक सुरक्षा की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है। हत्या (मर्डर) के मामलों में भी 2.4 प्रतिशत की मामूली कमी आयी है। साल भर में कुल 27,049 हत्याएं दर्ज की गयी हैं। इन आंकड़ों ने स्पष्ट कर दिया है कि हम अपने नौनिहालों, जो देश का भविष्य हैं, उनकी स्थिति कितनी चिंताजनक है। हम कितने असुरक्षित हैं। इसलिए आगामी वर्षों में सरकार और प्रशासन के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती साइबर सुरक्षा को मजबूत करने और बच्चों के खिलाफ उनके अपने ही परिवेश में हो रहे शोषण के आंकड़ों को सुधारने की होगी।

