
बाड़ी। कहने को तो बाड़ी का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र अब सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में तब्दील हो चुका है। लेकिन धरातल पर स्थितियां सुधरने के बजाय और बदतर हो गई हैं। लाखों की लागत से बना सुंदर भवन आज सफेद हाथी साबित हो रहा है। जहाँ मरीजों को इलाज के नाम पर सिर्फ ‘सफेद पर्चा’ और ‘रेफर’ की पर्ची थमा दी जाती है। क्षेत्र के बुजुर्ग आज भी वर्ष 1990 के उस दौर को याद करते हैं जब यह एक छोटा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हुआ करता था। उस समय पांच कुशल डॉक्टर और महिला चिकित्सक तैनात थे। जिनमें अनुभव और सेवा का मेल था। डॉक्टरों और कर्मचारियों का मरीजों के साथ आत्मीय संबंध था। लेकिन आज वह परंपरा पूरी तरह टूट चुकी है। वर्तमान में डॉक्टरों की कार्यप्रणाली पूरे क्षेत्र में चर्चा और आक्रोश का विषय बनी हुई है। ग्रामीणों का आरोप है कि अस्पताल में पदस्थ डॉक्टर मरीजों को हाथ तक लगाना उचित नहीं समझते। मामूली प्राथमिक उपचार के बाद मरीज को तुरंत जिला अस्पताल या भोपाल रेफर कर दिया जाता है जिससे गरीब परिजनों को निजी अस्पतालों की महंगी शरण लेनी पड़ती है।
अस्पताल की रोगी कल्याण समिति भी सवालों के घेरे में है। समिति के पास अपना व्यवस्थित कॉम्प्लेक्स है और बजट की भी कोई कमी नहीं है। फिर भी मरीजों को सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा। समिति की बैठकें कब होती हैं और क्या निर्णय लिए जाते हैं इसकी जानकारी न तो जनता को है और न ही पत्रकारों को। आरोप है कि मरीजों की सुविधा के नाम पर बाजार दर से अधिक के फर्जी बिल बनाकर सरकारी राशि का दुरुपयोग किया जा रहा है। यदि निष्पक्ष जांच हो तो भुगतान में बड़े घोटाले सामने आ सकते हैं। भवन बड़ा हो गया दर्जा बढ़ गया लेकिन बाड़ी की जनता आज भी इस रेफर संस्कृति से मुक्ति का इंतजार कर रही है। क्या प्रशासन इस ओर ध्यान देगा या फिर सफेद पर्चों का यह खेल यूँ ही चलता रहेगा ।
