नई दिल्ली | पश्चिम एशिया में गहराते संकट और युद्ध के हालातों ने भारतीय फुटवियर और चमड़ा उद्योग की कमर तोड़ दी है। उद्योग जगत ने केंद्र सरकार से सिंथेटिक चमड़े, धातु के सामान, मशीनरी, धागे और विशेष रसायनों जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल पर सीमा शुल्क (Customs Duty) हटाने की पुरजोर मांग की है। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय को सौंपे गए प्रस्ताव में निर्यातकों ने स्पष्ट किया है कि वैश्विक अस्थिरता के कारण इन आवश्यक इनपुट की लागत में 40 से 60 प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी हुई है। यदि सरकार तत्काल राहत नहीं देती, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता और घरेलू विनिर्माण क्षमता पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।
उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बंद किए जाने की धमकियों और तेल-गैस जहाजों की बाधित आवाजाही ने रबर रसायन, पीयू लेदर और गोंद जैसे पेट्रोलियम आधारित उत्पादों की कीमतों में आग लगा दी है। इसके अतिरिक्त, चीन, कोरिया और जापान से होने वाला आयात भी महंगा हुआ है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025-26 में चमड़ा उत्पादों का निर्यात 2.36 प्रतिशत गिरकर 4.26 बिलियन डॉलर रह गया है। इस गिरावट को रोकने के लिए निर्यातकों ने सरकार से प्रस्तावित ‘फ्लोट’ (FLOAT) योजना को जल्द लागू करने और कच्चे माल के शुल्क मुक्त आयात की सुविधा देने का आग्रह किया है।
लेदर सेक्टर में मंदी का असर सीधे तौर पर रोजगार और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहा है। फुटवियर कंपोनेंट्स, चमड़े के कपड़े और फर उत्पादों का निर्यात पिछले वर्षों की तुलना में अस्थिर बना हुआ है। हालांकि उद्योग को उम्मीद है कि गैर-चमड़ा वस्तुओं के साथ कुल निर्यात 5.6 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है, लेकिन इनपुट लागत में बेतहाशा वृद्धि इस लक्ष्य को हासिल करने में बड़ी बाधा बन रही है। उद्योग जगत का मानना है कि पैकेजिंग सामग्री और मशीनरी पर शुल्क राहत मिलने से छोटे और मध्यम स्तर के निर्माताओं को संजीवनी मिलेगी, जिससे वे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी पकड़ बनाए रख सकेंगे।

