एसआईआर प्रक्रिया असंवैधानिक और लोकतंत्र का मखौल: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी

नयी दिल्ली 18 अप्रैल (वार्ता) पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने देश भर में चल रहे मतदाता सूची गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे असंवैधानिक और जनता के खिलाफ एक षड्यंत्र करार दिया है।

मानवाधिकार संगठन ‘जनहस्तक्षेप’ की ओर से यहां प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में “सिलेक्टिंग द इलेक्टर्स: मॉकरी ऑफ डेमोक्रेसी” विषय पर आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए श्री कुरैशी ने कहा कि यह प्रक्रिया मतदाता सूची और चुनाव संबंधी कानूनों के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है।

श्री कुरैशी ने स्पष्ट किया कि वोटर लिस्ट में नाम होना और मतदान का अधिकार नागरिकों का संवैधानिक हक है, यह सरकार या चुनाव आयोग की कोई ‘मेहरबानी’ या ‘चैरिटी’ नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि एसआईआर की पूरी प्रक्रिया अपारदर्शी है और इसके जरिए नागरिकों का उत्पीड़न किया जा रहा है। उन्होंने सुझाव दिया कि चूंकि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियां अधूरी और त्रुटिपूर्ण हैं, इसलिए वहां पुरानी सूचियों के आधार पर ही मतदान कराया जाना चाहिए।

सेमिनार में उपस्थित बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं ने एक सुर में एसआईआर प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से समाप्त करने की मांग की। उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ शब्द के नाम पर लाखों लोगों को मताधिकार से वंचित किया जा रहा है, जो कि चिंताजनक है।

वहीं, आईएफटीयू की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अपर्णा ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि बंगाल के सीमावर्ती जिलों में काटी गई कुल सूचियों में से 58.5 प्रतिशत नाम मुस्लिम समुदाय के हैं। उन्होंने इसे ‘विदेशी घुसपैठ’ की धारणा स्थापित करने की कोशिश बताया, जिससे सबसे अधिक प्रवासी मजदूर और महिलाएं प्रभावित हो रही हैं।

प्रेस क्लब की अध्यक्ष संगीता बरुआ ने असम मॉडल का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां 19 लाख लोगों को अवैध घोषित किया गया था और अब बंगाल में भी वैसी ही स्थिति पैदा की जा रही है। जनहस्तक्षेप के सहसंयोजक अनिल दुबे ने चर्चा का समापन करते हुए कहा कि एसआईआर को परिसीमन और ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ से जोड़कर देखा जाना चाहिए, जिसका उद्देश्य करोड़ों गरीबों और अल्पसंख्यकों को मताधिकार से वंचित कर उन्हें केवल कॉर्पोरेट के लिए ‘सस्ता श्रम’ बनाकर रखना है।

सेमिनार में कुछ प्रस्ताव भी पारित किए गए। इनमें कहा गया है कि संगठन की मांग है कि पश्चिम बंगाल सहित देश भर में एसआईआर प्रक्रिया को तुरंत रोका जाए और 2025 की अपडेटेड सूची को आधार मानकर मतदान का अधिकार दिया जाए।

इसके अलावा एक प्रस्ताव में कहा गया है कि चुनाव आयोग का कार्य मतदाता सूची में नाम जोड़ना है, वह नागरिकता संबंधी दस्तावेजों की जांच कर गृह मंत्रालय का काम अपने हाथ में न ले और जिन मतदाताओं के नाम काटे गए हैं और जिनकी अपील लंबित है, उन्हें तत्काल मतदान की अनुमति दी जाए अन्यथा चुनाव बेमानी होंगे।

इस सभा में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर बद्री रैना और पूर्व राष्ट्रपति के ओएसडी रहे सत्यनारायण साहू, सहित बड़ी संख्या में पत्रकारों, छात्रों और कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। सभा की अध्यक्षता और संचालन वरिष्ठ एडवोकेट अशोक पांडा ने किया और जन हस्तक्षेप के सहसंयोजक अनिल दुबे ने चर्चा के लिए विषय की रूपरेखा प्रस्तुत की।

 

 

 

 

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