अब गुठली बनी ग्रामीण आदिवासियों के आजीविका का साधन

पांढुरना। प्रदेश के अंतिम सीमा पर स्थित आदिवासी बाहुल्य वाले इस पांढुरना विधानसभा क्षेत्र के

ग्रामीण अंचलो में रहने वाले विशेषकर आदिवासियों की आजीविका का मुख्य स्त्रोत महुआ का ही होता रहा हैं ,लेकिन यह सिजन समाप्त होने के बाद अब इन्हें गुठलि के सीजन से भी इन हजारों ग्रामीणों के हाथों को काम मिलने के साथ ही इनकी आमदानी में भी वृद्धि होने लगीं हैं ।

गांव,जंगलों में लाखों पेड़ 000

उल्लेखनीय हैं कि इस क्षेत्र के गांव के साथ ही जंगलों तथा किसानों के खेतो के मेंढो पर भी महुआ वृक्ष कि तरह चार (गुठलि ) के वृक्ष भी लाखो कि संख्या मे है, गुठलि की उपज को लेकर आदिवासी लोग अपनी अलग ही पहचान रखते है ।

आदिवासी,वनग्रामों में अच्छा उत्पादन 000

क्षेत्र के बिछवा कला, इटावा, पेंढोनी, घुडन खापा, पिपलपानी, मांडवी, बोरगांव सहीत वनांचल के सभी गांवो मे गुठलि का बढे मात्रा मे उत्पादन होता है ।

यहां के गुठली की महानगरों में मांग 000

प्रती दिन लाखो रुपए कि गुठलि यु ही बिक जाती है, दर्जनो व्यापारी यहा से गुठलि खरीदते है और मशीन से चिरौंजी निकाल कर नागपुर, पुणे, अहमदाबाद, हेद्राबाद आदि शहरो मे भेजते है ।

गुठली भी वनोपज है लेकीन महुआ की तरह इसकी बिक्रि पर भी सरकारी नियत्रंण नही होने के कारण आदिवासी बिचौलिए के; होथो लुटने को मजबुर है, इसे रोकने के लिए वन विभाग के पास कोई अधिकार नही है।

आदिवासी कंगाल ,बिचौलिए माल माल 000

कुछ, वर्षो पूर्व गुठलि की अवैध खरीदीऔर परिवहन पर वन विभाग की रोख थी लेकीन प्रतिबंध हटा दिया गया तब से आदिवासीयो को गुठली के सही दाम नही मिल रहे है, बिचौलिए गुठली पाई से खरीदते है और मशीन से चिरोंजी निकाल कर महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के व्यापारियो को भेजते है, एक माह के इस सिजन मे बिचौलिए जहा वर्ष भर की कमाई कर लेते है वही आदीवासी जंगल और खेतो से तोडकर लाने तथा सडाने के बाद कुठने -पिसने की हाडतोड मेहनत करने पर भी कंगाल ही रहते है ।

सरकारी नियंत्रण हो 000

आदीवासीयो का कहना है की गुठली वनोपज होने के कारण उसकी खरीदी – बिक्रि पर सरकारी नियंत्रण होना चाहीए, गौरतलब है की आदीवासी भोले -भाले और अशिक्षित होने के कारण बिचौलीए उनका जमकर शोषण करते है ।

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