पराली जलाने की समस्या से निपटने के लिए कृषि मंत्रालय ने ‘हैप्पी सीडर’ तकनीक पर दिया जोर: मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और प्रदूषण रोकने में मिलेगी बड़ी मदद

नई दिल्ली | वायु प्रदूषण और पराली जलाने की गंभीर समस्या से निपटने के लिए केंद्रीय कृषि मंत्रालय अब टिकाऊ खेती और आधुनिक मशीनीकरण को बढ़ावा दे रहा है। इस पहल के केंद्र में ‘हैप्पी सीडर’ और ‘सुपर सीडर’ जैसी मशीनें हैं, जो फसल अवशेषों को बिना जलाए सीधे बुआई करने की सुविधा प्रदान करती हैं। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के अनुसार, ये मशीनें पराली को छोटे टुकड़ों में काटकर मिट्टी में मिला देती हैं, जो बाद में जैविक खाद में बदल जाती है। इससे न केवल जहरीले धुएं से मुक्ति मिलती है, बल्कि रसायनों पर निर्भरता कम होने से मिट्टी की सेहत में भी उल्लेखनीय सुधार होता है।

योजना के प्रभावी होने के बावजूद, जमीनी स्तर पर छोटे किसानों को तकनीकी और आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश और हरियाणा के किसानों का कहना है कि हैप्पी सीडर जैसी बड़ी मशीनें खरीदना और चलाना उनके लिए प्रैक्टिकल नहीं है, क्योंकि सरकारी सब्सिडी का बड़ा हिस्सा बड़ी मशीनों पर ही केंद्रित है। इसके अलावा, गांवों में इन मशीनों की सीमित संख्या होने के कारण बुआई के पीक सीजन में सभी किसानों को समय पर उपकरण नहीं मिल पाते। किसानों ने मंत्रालय से मांग की है कि तकनीक में ऐसे बदलाव किए जाएं जिससे छोटे ट्रैक्टरों के माध्यम से भी इसका लाभ उठाया जा सके।

केंद्र सरकार पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में फसल अवशेष प्रबंधन (CRM) योजना के माध्यम से इन-सीटू (खेत के अंदर) और एक्स-सीटू (खेत के बाहर) समाधानों पर काम कर रही है। इस योजना के तहत मशीनों पर भारी सब्सिडी दी जा रही है ताकि किसान पराली को बोझ समझने के बजाय उसे संसाधन के रूप में उपयोग करें। सरकार का लक्ष्य जागरूकता फैलाकर इनपुट लागत को कम करना और पर्यावरण के अनुकूल खेती को बढ़ावा देना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि छोटे किसानों की पहुंच इन मशीनों तक सुलभ हो जाए, तो पराली जलाने की प्रथा को पूरी तरह समाप्त किया जा सकता है।

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