मुंबई | भारत में कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड के वितरण में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। ‘सत्वा कंसल्टिंग’ की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अब कंपनियां केवल मुंबई जैसे महानगरों तक सीमित न रहकर छोटे शहरों और औद्योगिक जिलों पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। पिछले तीन वर्षों में मदुरै, वाराणसी और वडोदरा जैसे शहरों में सीएसआर खर्च में 55 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वर्तमान में देश की 4,000 से अधिक कंपनियां सालाना लगभग 30,000 करोड़ रुपये सामाजिक कार्यों पर खर्च कर रही हैं, जो देश के संतुलित विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2022 से 2024 के बीच औद्योगिक जिलों में सीएसआर फंड के प्रवाह में 120 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई है। विशेष रूप से मेटल, माइनिंग और एनर्जी क्षेत्र की कंपनियां अब अपने संचालन क्षेत्रों जैसे ओडिशा के झारसुगुड़ा और जामनगर के आसपास निवेश करना अधिक पसंद कर रही हैं। इसके अतिरिक्त, सरकार द्वारा चिन्हित ‘आकांक्षी जिलों’ में भी सुधार देखा गया है, जहाँ सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने अपने बजट का लगभग 11 प्रतिशत खर्च किया है। यह रुझान दर्शाता है कि कॉर्पोरेट जगत अब उन इलाकों तक पहुँच रहा है, जिन्हें वास्तव में विकास की अधिक आवश्यकता है।
सीएसआर परियोजनाओं का स्वरूप अब और अधिक स्थानीय होता जा रहा है, जहाँ लगभग 85 प्रतिशत प्रोजेक्ट्स एक ही जिले तक सीमित हैं। दिलचस्प बदलाव यह भी है कि अब केवल गैर-सरकारी संगठनों (NGO) के बजाय विश्वविद्यालयों, अस्पतालों और इनक्यूबेटरों को भी बड़े पैमाने पर फंड मिल रहा है। हालांकि, रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि अब भी 75 प्रतिशत खर्च केवल 200 जिलों तक सिमटा हुआ है, जिससे विकास की आवश्यकताओं और फंड के वितरण के बीच एक असंतुलन बना हुआ है। आने वाले समय में बड़ी कंपनियों से उम्मीद है कि वे अपने निवेश को और अधिक फैलाकर इस खाई को पाटने का प्रयास करेंगी।

