मध्य पूर्व में जारी युद्ध ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था कितनी नाजुक और परस्पर निर्भर है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा द्वारा व्यक्त चिंता केवल एक संस्थागत प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि आने वाले आर्थिक संकट का संकेत है. धीमी होती विकास दर और बढ़ती महंगाई का जो मिश्रण सामने आ रहा है, वह विश्व अर्थव्यवस्था के लिए एक कठिन दौर की शुरुआत हो सकता है.
तेल और गैस की आपूर्ति में आई 13 प्रतिशत की कमी इस संकट की गंभीरता को रेखांकित करती है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे सामरिक रूप से महत्वपूर्ण जलमार्ग पर तनाव का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ा है. यह वही मार्ग है जिससे दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का व्यापार होता है. ऐसे में किसी भी प्रकार की बाधा केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक संकट का रूप ले लेती है. तेल की बढ़ती कीमतें न केवल परिवहन और उत्पादन लागत को बढ़ाती हैं, बल्कि आम उपभोक्ता की जेब पर भी सीधा असर डालती हैं.
चिंता की बात यह है कि यह संकट केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं है. गैस, हीलियम और उर्वरकों की आपूर्ति में व्यवधान ने कृषि और उद्योग दोनों को प्रभावित किया है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, 72 ऊर्जा सुविधाओं को नुकसान पहुंचा है, जिनमें से एक-तिहाई गंभीर रूप से प्रभावित हैं. यह स्थिति वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव को और बढ़ाती है, जिससे उत्पादन में गिरावट और कीमतों में वृद्धि तय है.
इस पूरे परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ऊर्जा निर्यातक देश भी इससे अछूते नहीं हैं. कतर जैसे देश, जो प्राकृतिक गैस के बड़े निर्यातक हैं, उत्पादन में आई क्षति से जूझ रहे हैं. यह तथ्य इस धारणा को तोड़ता है कि केवल आयातक देश ही युद्ध का खामियाजा भुगतते हैं. दरअसल, वैश्विक अर्थव्यवस्था की आपसी कडिय़ों ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि किसी एक क्षेत्र में संकट का असर अंतत: सभी पर पड़ता है.
आईएमएफ द्वारा आगामी वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक में संशोधित अनुमानों का प्रस्तुत किया जाना इस बात का संकेत है कि वैश्विक विकास दर में गिरावट लगभग तय है. हाल तक 2026 में 3.3 प्रतिशत और 2027 में 3.2 प्रतिशत की वृद्धि दर की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन युद्ध ने इन अनुमानों को अनिश्चितता के घेरे में डाल दिया है. महंगाई और धीमी वृद्धि का यह ‘स्टैगफ्लेशन’ जैसा परिदृश्य नीति निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है.
ऐसे समय में विश्व समुदाय के सामने सबसे बड़ी आवश्यकता है,संवाद और स्थिरता की दिशा में ठोस प्रयास. युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता, लेकिन इसके आर्थिक दुष्परिणाम लंबे समय तक महसूस किए जाते हैं. भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह चुनौती और भी बड़ी है, जहां ऊर्जा आयात पर निर्भरता अधिक है और महंगाई का सीधा असर आम नागरिक पर पड़ता है. कुल मिलाकर यह संकट केवल आर्थिक नहीं, बल्कि वैश्विक सहयोग की परीक्षा भी है. यदि समय रहते कूटनीतिक समाधान नहीं निकाला गया, तो यह युद्ध न केवल सीमाओं तक सीमित रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की आर्थिक सेहत को गहरी चोट पहुंचाएगा.
