नयी दिल्ली, 07 अप्रैल (वार्ता) केंद्र सरकार ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय को अवगत कराया कि धार्मिक प्रथाओं से जुड़े सामाजिक सुधार के मुद्दे न्यायपालिका के बजाय विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
यह दलील तब दी गई जब नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मामले में अंतिम सुनवाई शुरू की। केंद्र सरकार की ओर से दलीलें शुरू करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अदालतों को आस्था के मामलों में संयम बरतना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी पूजा स्थल पर एक निश्चित आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश को प्रतिबंधित करने को भेदभाव नहीं कहा जा सकता है।
श्री मेहता ने दलील दी कि संविधान सामाजिक कल्याण और सुधार की जिम्मेदारी विधायिका को सौंपता है। अदालतों का काम धार्मिक प्रथाओं में सुधार करना नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ अनुच्छेद 25 और 26 के दायरे की जांच कर रही है, जो धर्म की स्वतंत्रता और धार्मिक संप्रदायों को अपने मामलों के प्रबंधन का अधिकार देते हैं।
श्री मेहता ने तर्क दिया कि सबरीमाला में रजस्वला (10 से 50 वर्ष) आयु की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने वाले 2018 के फैसले ने ‘हिंदू धर्म की बहुलता और विविधता को संकुचित’ करने का काम किया था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की धार्मिक परंपराएं स्वाभाविक रूप से विविध हैं।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा, “यदि कोई संप्रदाय किसी विशिष्ट धार्मिक संस्थान में प्रवेश को विनियमित करना चाहता है, तो ऐसे दावे की जांच इस तरह से की जानी चाहिए जिससे धार्मिक विविधता और संप्रदाय के अधिकारों की रक्षा हो सके।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि किसी वर्ग के व्यक्तियों पर सभी संस्थानों में पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाता है, तो वहां नागरिक अधिकारों और धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक होगा।
श्री मेहता ने स्पष्ट किया कि भगवान अयप्पा को ‘ब्रह्मचारी’ मानने की आस्था का सम्मान करना गरिमा का हनन नहीं, बल्कि विश्वास की मान्यता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत उतना पितृसत्तात्मक नहीं है जितना पश्चिम में अक्सर इसे समझा जाता है। भारत में महिलाओं को उच्च स्थान दिया जाता है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया कि क्या किसी समूह की मोक्ष प्राप्ति से जुड़ी पूजा पद्धति के विश्वास को समानता की कसौटी पर परखा जा सकता है।
न्यायूमूर्ति बी वी नागरत्ना ने सबरीमाला के संदर्भ में अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन) को लागू करने पर सवाल उठाया। उन्होंने टिप्पणी की कि अनुच्छेद 17 इस तरह लागू नहीं हो सकता, जहाँ तीन दिन के लिए अस्पृश्यता का अभ्यास हो और चौथे दिन खत्म हो जाए। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जहाँ सामाजिक बुराइयों को धार्मिक प्रथाओं के रूप में पेश किया जाता है, वहां अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं।
न्यायूमूर्ति एम एम सुंदरेश ने आस्था और तर्क के बीच अंतर बताते हुए कहा, “विज्ञान तर्क पर आधारित है, जबकि धर्म विश्वास पर आधारित है।” उन्होंने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित हो सकता है और अदालतें धर्मशास्त्रीय विशेषज्ञों की भूमिका नहीं निभा सकतीं।
सॉलिसिटर जनरल बुधवार को भी अपनी दलीलें जारी रखेंगे।
