स्वास्थ्य विभाग घोटाला: नए चेहरे रडार पर, दागियों पर एफआईआर की तैयारी

जबलपुर: जिला स्वास्थ्य विभाग में सामने आए 4 करोड़ से अधिक की राशि के गबन मामले में अब प्रशासनिक कार्रवाई के बाद पुलिसिया शिकंजे की तैयारियां शुरू हो गईं हैं। खबर है कि वित्तीय अनियमितता के इस बड़े प्रकरण में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संजय मिश्रा के निलंबन और भोपाल अटैचमेंट के बाद अब विभाग के अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों पर एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया पर विचार किया जा रहा है। जांच दल द्वारा जुटाए गए साक्ष्यों के आधार पर यह बिल्कुल माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में कई नए चेहरे भी इस घोटाले की साजिश में शामिल पाए जा सकते हैं। जिनके खिलाफ भी एफआईआर की कार्रवाई होना लगभग तय माना जा रहा है।

कलेक्टर द्वारा गठित जांच दल अब मामले की बारीकी से पड़ताल कर सभी कड़ियों को जोड़ने में जुटा है। डॉ. संजय मिश्रा को भोपाल संभाग में मुख्यालय नियत किए जाने के बाद अब जबलपुर कार्यालय में नए सिरे से व्यवस्थाएं बनाई जा रही हैं। यह स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार के इस संगठित ढांचे को ध्वस्त करने के लिए केवल निलंबन पर्याप्त नहीं है। विभाग के वरिष्ठ सूत्रों का कहना है कि जैसे ही जांच रिपोर्ट के अंतिम तथ्य सामने आएंगे, संबंधित थाना क्षेत्र में नामजद एफआईआर दर्ज कराई जाएगी। इसमें फर्जी फर्म के मालिक, संबंधित भुगतान अधिकारी और रिकॉर्ड गायब करने वाले संदिग्धों को आरोपी बनाया जा सकता है। आने वाले सप्ताह में इस मामले में बड़ी गिरफ्तारी और नए खुलासों की पूरी संभावना बनी हुई है।
तो लगेंगी क्या धोखाधड़ी और जालसाजी की धाराएं ?
विदित हो कि लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा जारी आदेश के बाद डॉ. संजय मिश्रा को उनके दोनों महत्वपूर्ण पदों से हटा दिया गया है। वे प्रभारी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी और सह क्षेत्रीय संचालक स्वास्थ्य सेवाएं जबलपुर के रूप में कार्यरत थे। निलंबन की इस कार्रवाई को केवल प्रशासनिक सजा के रूप में नहीं देखा जा रहा है, बल्कि विभाग अब इस मामले को पुलिस को सौंपने की तैयारी में है। जिस तरह से फर्जी बिलों के माध्यम से भोपाल की एक फर्म को 93 लाख 04 हजार 998 रुपए का भुगतान किया गया, वह सीधे तौर पर जालसाजी और धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है। प्रशासन अब दोषियों के विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई के लिए दस्तावेज तैयार कर रहा है।
जांच के रडार पर आए कई और संदिग्ध नाम
अब ये जाँच अधिकारियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि जिला कार्यक्रम प्रबंधक कार्यालय और फार्मासिस्ट स्तर पर भी गहरी मिलीभगत के संकेत मिले हैं। वर्तमान में जिला कार्यक्रम प्रबंधक आदित्य तिवारी और फार्मासिस्ट जवाहर लोधी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई का प्रस्ताव नेशनल हेल्थ मिशन के डायरेक्टर को भेजा जा चुका है। इनके साथ ही स्टोर कीपर का दायित्व संभाल रहे फार्मासिस्ट नीरज कौरव को कलेक्टर राघवेंद्र सिंह पहले ही निलंबित कर चुके हैं।
जांच की सुई अब उन कर्मचारियों की ओर भी घूम रही है जिन्होंने फाइल को आगे बढ़ाने और फर्जी भौतिक सत्यापन रिपोर्ट तैयार करने में मदद की।
जांच में सब कुछ हुआ साफ
प्रकरण की जांच में यह तथ्य पूरी तरह साफ हो चुका है कि स्वास्थ्य केंद्रों के लिए साइनेज और अन्य सामग्रियों के नाम पर केवल कागजों पर ही सामान की खरीदी दिखाई गई। भौतिक रूप से विभाग को कोई सामग्री प्राप्त नहीं हुई, लेकिन फाइलों में फर्जी पावती लगाकर भुगतान कर दिया गया। डीपीएम कार्यालय द्वारा 1.33 करोड़ रुपए और नियमित सीएमएचओ कार्यालय द्वारा लगभग 3 करोड़ रुपए के क्रय आदेश नियमों को ताक पर रखकर जारी किए गए। भोपाल की निजी फर्म सिंह इंटरप्राईजेज को किए गए इन भुगतानों में किसी भी प्रकार की पारदर्शिता नहीं बरती गई।

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