
खंडवा। जिले में चने की सरकारी खरीदी का पहला ही दिन भारी अव्यवस्थाओं की भेंट चढ़ गया। आलम यह है कि उपार्जन केंद्रों पर फसल की पहचान यानी ‘टैग’ ही नहीं पहुँचे हैं। घंटों इंतजार के बाद जब किसानों का धैर्य जवाब देने लगा, तो केंद्रों पर नियमों को ताक पर रखकर बिना टैग के ही खरीदी शुरू कर दी गई। नवभारत की टीम ने जब कोरगला रोड स्थित वर्मा वेयरहाउस का जायजा लिया, तो वहां जिम्मेदारों की बड़ी लापरवाही और सिस्टम की लाचारी साफ नजर आई।
वर्मा वेयरहाउस पर दोपहर तक लगभग 150 क्विंटल चने की खरीदी बिना टैग लगाए ही कर ली गई थी।
नियमों के मुताबिक, तुलाई के तुरंत बाद टैग लगाना अनिवार्य है, लेकिन यहाँ बोरियां बिना किसी आधिकारिक पहचान के खुले में पड़ी मिलीं। टैग के बिना पोर्टल पर एंट्री संभव नहीं है, जिसका सीधा मतलब है कि किसानों के बिल जनरेट नहीं होंगे और भुगतान में देरी तय है। बिना टैग के सैकड़ों क्विंटल अनाज का स्टॉक करना कार्यप्रणाली पर कई प्रश्नचिन्ह खड़े करता है। बाद में ये बोरियां किसकी हैं, इसकी पहचान करना मुश्किल होगा।
किसान परेशान
ट्रैक्टर लेकर पहुंचे किसान इस बात से चिंतित हैं कि बिना रसीद या बिल के वे अपना अनाज केंद्र पर कैसे छोड़ें। अब इसे स्मार्ट गवर्नेंस कहें या सरासर लापरवाही? जब तारीखें पहले से तय थीं, तो एसी में बैठे अफसर टैग भेजना कैसे भूल गए? अब वेयरहाउस पर दोबारा सिलाई का खेल होगा, जिसका खामियाजा सिर्फ और सिर्फ किसान भुगतेगा। अन्नदाता की मेहनत को ‘टैग’ के भरोसे लटकाना समझ से परे है।
जब इस संबंध में केंद्र प्रभारी और जिम्मेदारों से सवाल किया गया, तो चौंकाने वाला जवाब मिला:
= भोपाल से अटका काम: अधिकारियों का कहना है कि टैग भोपाल स्तर से ही जारी नहीं हो पाए हैं।
= 3 दिन का और इंतजार: बताया जा रहा है कि टैग आने में अभी 2 से 3 दिन का समय और लग सकता है।
= दोबारा होगी सिलाई: वर्तमान में खरीदी गई बोरियों को टैग आने के बाद फिर से खोलकर या दोबारा सिलाई कर टैग लगाए जाएंगे, जिससे न केवल समय की बर्बादी होगी बल्कि अनाज की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
