शिक्षकों की आवाज बनकर उभरे पटेल-चौहान

मालवा- निमाड़ की डायरी

संजय व्यास

अंचल के 2 सांसद इन दिनों नौकरी के संकट से जूझ रहे शिक्षकों की आवाज बनकर उभरे हैं. इन शिक्षकों में तो कई ऐसे हैं जिसका सेवा काल करीब ढाई दशक हो चुका है. इतने अनुभव के बाद भी उन पर अब सेवा बरकरारी के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) उत्तीर्ण करने की तलवार लटक रही है. उनकी पीड़ा को देखते हुए संसद में क्षेत्र के खरगोन-बड़वानी व आलीराजपुर सांसद गजेंद्र पटेल और अनिता चौहान ने उक्त निर्णय पर सरकार से पुनर्विचार करने की बात रखी. उन्होंने सदन को अवगत कराया कि जिन शिक्षकों ने लंबे समय से शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करते हुए अपना अनुभव और योगदान दिया है, उन्हें बार-बार परीक्षा के दायरे में लाना न्यायसंगत नहीं है. बड़ी संख्या में ऐसे शिक्षक हैं जिनकी नियुक्ति शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 लागू होने से पूर्व नियमानुसार की गई थी, उस समय टीईटी का कोई प्रावधान नहीं था.

इन शिक्षकों की नियुक्ति तत्कालीन एनसीटीई के नियमों के अंतर्गत पूरी तरह वैध रूप से हुई थी और वे वर्षों से निरंतर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. वर्तमान में टीईटी को अनिवार्य किए जाने से उन्हें व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उनके मनोबल पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. ऐसी परिस्थितियों में टीईटी की अनिवार्यता से राहत प्रदान करना न्यायसंगत और आवश्यक है. उल्लेखनीय है कि लाख के करीब शिक्षक 1998 से अब तक सेवा में आए हैं. इस परीक्षा से 5 साल सेवा काल शेष वाले शिक्षकों को छूट दी गई है. इसके बावजूद करीब 60 हजार से ज्यादा शिक्षकों के सामने टीईटी का संकट मुंह बाए खड़ा है. सांसदों के संसद में उनकी आवाज उठाने से उन्हें उम्मीद की किरण नजर आ रही है. हालांकि सरकार ने परीक्षा की अनिवार्यता सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर की है. अब देखते हैं सदन में रखी गई पुनर्विचार की बात पर सरकार क्या रास्ता निकालती है और प्रभावित शिक्षकों को राहत प्रदान कर पाती है या नहीं.
वरिष्ठों की खींचतान, भुगत रहे कार्यकर्ता
जनजातीय मंत्री विजय शाह की कोशिशों के बाद भी खंडवा जिले के भाजपा नेताओं की खींचतान नजर आ ही जाती है. ताजा मामला एल्डर मैन की नियुक्तियों का है. सांसद, जिले के विधायकों और जिला संगठन के एकमत न होने का खामियाजा लंबे समय से राजनीतिक नियुक्तियों के लिए प्रतीक्षारत कार्यकर्ताओं को उठाना पड़ा है. निमाड़ अंचल में जहां पर नगर निकायों में एल्डरमैन की सूची जारी हो गई, वहीं खंडवा के इससे वंचित रहने से दावेदारों को मायूसी का सामना करना पड़ा है. जनप्रतिनिधि और वरिष्ठ नेताओं की अपने समर्थकों के नाम शामिल करवाने की जिद के कारण खंडवा जिले के नगर निकायोंं में एल्डर मैनों का फैसला फिलहाल नहीं हो पाया. अब अगली सूची के आने तक मुंदी, हरसूद, पंधाना और ओंकारेश्वर के दावेदार भोपाल की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं.
नियुक्तियों के बाद भी असमंजस
रतलाम जिले में प्रशासनिक गड़बड़ी के कारण एल्डर मैनों के नामों पर असमंजस बरकरार है. शासन द्वारा नगर परिषदों के लिए जारी एल्डरमैन सूची में रतलाम जिले से चौंकाने वाली विसंगतियां सामने आई हैं. सूची में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां एल्डरमैन के नाम, उनके पिता के नाम और सरनेम आपस में मेल नहीं खा रहे हैं, जिससे सूची की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं. इन्हें पुलिस वेरिफिकेशन के बाद ही पदभार ग्रहण का अधिकार मिलेगा. जब घोषित नामों में पिता का नाम, सरनेम ही मेल नहीं खाएगा तो पुलिस वेरिफिकेशन कैसे होगा. अपने दायित्व ग्रहण करने में आ रही अड़चनों से बेचैनी बनी हुई है. यह चर्चा भी तेज हो गई है कि ये त्रुटियां किस स्तर पर हुई हैं,स्थानीय निकाय, जिला प्रशासन या शासन स्तर पर. एल्डरमैन सूची का लंबे समय से इंतजार कर रहे भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं में इस मामले को लेकर भारी नाराजगी देखी जा रही है

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