देश में ‘इच्छामृत्यु’ की पहली अनुमति पाने वाले हरीश राणा का दिल्ली में अंतिम संस्कार, 13 साल कोमा में रहने के बाद अंगदान कर पेश की मानवता की मिसाल

नई दिल्ली | गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा का आज दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित श्मशान घाट में पूर्ण हिंदू रीति-रिवाजों के साथ अंतिम संस्कार किया गया। सुबह एम्स (AIIMS) से उनके पार्थिव शरीर को श्मशान घाट लाया गया, जहाँ उनके भाई और बहन ने संयुक्त रूप से मुखाग्नि दी। इस हृदयविदारक घड़ी में ब्रह्माकुमारी दीदी, दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और बड़ी संख्या में मित्रगण मौजूद रहे। मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा निवासी अशोक राणा के पुत्र हरीश वर्ष 2013 में चंडीगढ़ में हुए एक हादसे के बाद से कोमा में थे। उनके पिता और मां की आंखें बेटे को खोने के गम में डूबी थीं, लेकिन समाज ने उनके धैर्य की सराहना की।

हरीश राणा भारत के कानूनी इतिहास में ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ (Passive Euthanasia) की अनुमति पाने वाले पहले व्यक्ति बने थे। 13 वर्षों से अधिक समय तक बिस्तर पर अचेत अवस्था में रहने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने उनके परिवार की याचिका पर उन्हें यह विशेष अनुमति प्रदान की थी। 14 मार्च को उन्हें गाजियाबाद स्थित आवास से एम्स के पैलिएटिव केयर यूनिट में स्थानांतरित किया गया था, जहाँ मंगलवार शाम 4 बजकर 10 मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके परिवार ने एक दशक से अधिक समय तक उनकी सेवा की, जो माता-पिता के निस्वार्थ प्रेम और संघर्ष की एक मिसाल बन गई है।

दुख की इस घड़ी में भी राणा परिवार ने मानवता के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए हरीश के अंगदान का साहसिक फैसला लिया। हरीश के निधन के बाद उनके दो कॉर्निया (आंखें) और हार्ट वाल्व जैसे महत्वपूर्ण टिश्यू दान किए गए हैं। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, हरीश की आंखों से अब किसी के जीवन में उजाला होगा और उनके हार्ट वाल्व किसी अन्य मरीज को नई जिंदगी देंगे। समाज के लोगों और चिकित्सा जगत ने इस निर्णय को एक बड़ी प्रेरणा बताया है। हरीश का संघर्ष भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन उनके अंगों के माध्यम से वे दूसरों के जीवन में जीवित रहेंगे।

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