मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा गुड़ी पड़वा के पावन अवसर पर ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ के तीसरे चरण का शुभारंभ केवल एक प्रशासनिक पहल नहीं, बल्कि एक दूरदृष्टि से भरा सामाजिक-सांस्कृतिक संदेश भी है. जब पूरा देश जल संकट की चुनौती से जूझ रहा है, तब 55 जिलों में एक साथ इस तरह का व्यापक अभियान चलाना राज्य सरकार की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करता है.
लगभग 2,500 करोड़ रुपए के बजट के साथ यह अभियान केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि जमीन पर ठोस बदलाव की एक गंभीर कोशिश है. 19 मार्च से 30 जून तक चलने वाला यह महाअभियान उस समय में आयोजित किया जा रहा है, जब मानसून से पहले जल संरचनाओं को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक होता है. इस दृष्टि से समय का चयन भी रणनीतिक और व्यावहारिक है.
अभियान के तहत 10,000 से अधिक चेक डैम और स्टॉप डैम की मरम्मत, पुराने तालाबों और बावडिय़ों का जीर्णोद्धार, सूखी नदियों का पुनर्जीवन और भूजल रिचार्ज के लिए नई संरचनाओं का निर्माण जैसे कार्य, यदि प्रभावी ढंग से क्रियान्वित होते हैं, तो यह प्रदेश की जल संरचना में स्थायी सुधार ला सकते हैं. मध्य प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्य के लिए यह पहल केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता का भी आधार बन सकती है.
इस अभियान की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी बहु-विभागीय भागीदारी है. 18 विभागों का एक साथ काम करना प्रशासनिक समन्वय की एक बड़ी परीक्षा भी है और अवसर भी. पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को नोडल बनाकर सरकार ने यह संकेत दिया है कि जल संरक्षण का वास्तविक केंद्र गांव और स्थानीय समुदाय ही हैं. यदि पंचायत स्तर पर सक्रियता और पारदर्शिता सुनिश्चित होती है, तो यह अभियान जन-भागीदारी का एक सफल मॉडल बन सकता है.
इंदौर के इस्कॉन मंदिर से अभियान की शुरुआत और गंगा जल अर्पण जैसे सांस्कृतिक प्रतीक यह दर्शाते हैं कि सरकार जल संरक्षण को केवल तकनीकी या विकासात्मक मुद्दा नहीं, बल्कि आस्था और जनभावना से जोडक़र देख रही है. भारत जैसे देश में, जहां प्रकृति और संस्कृति का गहरा संबंध है, यह दृष्टिकोण अधिक प्रभावी साबित हो सकता है. जब जल संरक्षण एक ‘जन-आंदोलन’ का रूप लेता है, तभी उसकी सफलता सुनिश्चित होती है.
हालांकि, चुनौतियां भी कम नहीं हैं. पूर्व के कई अभियानों की तरह यह पहल भी केवल कागजों तक सीमित न रह जाए, यह सुनिश्चित करना सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी. कार्यों की गुणवत्ता, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और समयबद्ध क्रियान्वयन ऐसे पहलू हैं, जिन पर सरकार को विशेष ध्यान देना होगा. साथ ही, स्थानीय समुदायों की निरंतर भागीदारी के बिना इस तरह के अभियान लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह सकते. कुल मिलाकर, ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ केवल जल संरक्षण की पहल नहीं, बल्कि यह आने वाले समय की विकास राजनीति का संकेत भी है. जो राज्य अपने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करेगा, वही स्थायी विकास की दौड़ में आगे रहेगा. मध्य प्रदेश ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है. अब आवश्यकता इस बात की है कि यह संकल्प जमीनी हकीकत में बदल सके.
सबसे बड़ी बात यह है कि मानसून आने के काफी पहले यह अभियान शुरू किया गया है. जाहिर है इससे जल संवर्धन की दृष्टि से महत्वपूर्ण काम होगा.
