
साक्षी केसरवानी भोपाल। कभी घर, आंगन और छत की पहचान रही गौरैया बीते 15 सालों में भोपाल शहर सहित देश के हर शहरी क्षेत्र से लगभग गायब सी हो गई थी। लेकिन अब तस्वीर बदलने लगी है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) की एक रिपोर्ट के अनुसार देश भर में 15.73 प्रतिशत आबादी के साथ गौरैया (हाउस स्पैरो) तीसरी सबसे अधिक पायी जाने वाली प्रजाति है। वहीं सबसे अधिक कौवा (हाउस क्रो) 20.72 प्रतिशत और मैना (कॉमन मैना) 17.68 प्रतिशत के साथ देश में दूसरी सबसे अधिक आबादी वाला पक्षी है। जबकि मध्यप्रदेश में गौरैया 6.1 प्रतिशत की संख्या के साथ रेड वेटेड बुलबुल के बाद दूसरे नंबर है।
क्यों कम हुई गौरैया
शहरीकरण, कंक्रीट के मकान, खुली जगहों की कमी और भोजन के स्रोतों में गिरावट गौरैया के कम होने के प्रमुख कारण हैं। पहले घरों की छतों और दीवारों में छोटे छेद, आंगन और पेड़ होते थे जहां गौरैया आसानी से घोंसला बना लेती थी, लेकिन आधुनिक निर्माण में यह स्थान खत्म हो गए हैं। वहीं कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग से उनके भोजन में भी कमी आई है। जो इनकी घटती संख्या का कारण है।
बिनिश रफत,प्रभारी वैज्ञानिक,क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान केंद्र
सुरक्षित स्थान पाकर फिर लौट रही गौरैया
वर्ष 2015 से लगातार चल रहे जागरूकता अभियानों के तहत ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में संभावित स्थानों पर नेस्ट हाउस वितरित किए जाने शुरू किए गए। इसमें कई जगहों पर स्टडी मे देखा गया कि, जिन जगहों पर गौरैया की उपस्थिति थी वहां गौरैया फिर से दिखनी शुरू हो गई। बता दें गौरैया कोई प्रवासी पक्षी नहीं है, इसलिए वो एक जगह क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में नहीं जाती बल्कि वह अपने आसपास के वातावरण के अनुसार ही रहती है। वहीं शहर में कई लोग घरों में दाना पानी रखने के साथ इनके लिए छोटे घर बनाकर भी रख रहे हैं, जिससे गौरैया को सुरक्षित ठिकाना मिल रहा है। एमओईएफसीसी रिपोर्ट के अनुसार इनकी उपस्थिति सुरक्षित स्थान और भोजन मिलने पर मानव-निर्मित वातावरण में करीब 80 प्रतिशत, अर्ध-शहरी क्षेत्रों में 78-84 प्रतिशत और शहरी इलाकों में 68 प्रतिशत तक हो सकती है।
डॉ संगीता राजगिर,बर्ड एक्सपर्ट
40 से 50 प्रतिशत तक बढ़ी संख्या:
विशेषज्ञों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में किए गए प्रयासों के चलते राजधानी में पुराने भोपाल, मिसरोद, एक्सटेंशन वाली कालोनी, बागमुगलिया, कोलार जैसे कई क्षेत्रों में गौरैया की संख्या में 40 से 50 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह पहले से अधिक दिखने लगी है, जबकि ग्रामीण इलाकों से सटे शहरी क्षेत्रों में भी अब धीरे धीरे इनकी मौजूदगी बढ़ रही है।
मौसम और प्रदूषण का असर:
बर्ड एक्सपर्ट मो. खालिक बताते हैं बढ़ता वायु प्रदूषण (PM2.5) की स्थिति से भी गौरैया की संख्या को प्रभावित होती है। मार्च के महीने में गौरैया दिवस मानने का उद्देश्य भी यही है कि ये समय इनके प्रजनन करने का होता है। ऐसे में इन्हें सुरक्षित वातावरण के साथ संयमित मौसम की आवश्यकता होती है। इसीलिये गौरैया खुले हरे स्थानों और मध्यम तापमान वाले क्षेत्रों में ज्यादा देखी जा रही है।
नेस्ट हाउस बनाते समय रखें ध्यान:
विशेषज्ञों के अनुसार गौरैया के लिए लकड़ी के बॉक्स की जगह कार्डबोर्ड का उपयोग ज्यादा बेहतर रहता है क्योंकि उसमें दीमक लगने की संभावना नहीं होती है। बस इन्हें किसी छज्जे या पेड़ की आड़ में रखें। वहीं घर को बनाते या खरीदते समय इसके आकार को जरूर देखें, जो कि 150× 1170 mm और खुला मुख 32 mm का होना चाहिए। जिससे अन्य पक्षी इसमें प्रवेश न करें और सुरक्षित माहौल मिले।
छोटी कोशिश से लौटेगी चहचहाहट:
पुरानी चहचहाहट वापस लाने घर की छत या बालकनी में दाना और पानी रखें। नेस्ट बॉक्स या छोटे घोंसले लगाएं। कीटनाशकों का कम उपयोग करें। पेड़ पौधे लगाएं और हरियाली बढ़ाएं और गर्मियों में पानी के छोटे बर्तन खुले स्थान पर रखें।
