ट्रेनों की चपेट में आने से हाथियों की मौत की घटनाओं पर वन मंत्रालय की कार्यशाला में हुआ मंथन

नयी दिल्ली 12 मार्च (वार्ता) सरकार ट्रेनों की चपेट में आने से होने वाली हाथियों की मौत की घटनाओं को लेकर चिंतित है और इन्हें बचाने के लिए विभिन्न कदम उठा रही है। इसी कड़ी में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के प्रोजेक्ट एलिफेंट डिविजन ने देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्लूयआईआई) में 10 और 11 मार्च को राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया।

‘रेल पटरियों पर हाथियों की मृत्यु दर को कम करने के लिए नीति कार्यान्वयन’ विषय पर आयोजित इस दो दिवसीय कार्यशाला में रेल मंत्रालय, हाथी-बहुल राज्यों के वन विभागों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों और प्रमुख संरक्षण वैज्ञानिकों सहित 40 प्रतिभागियों ने भाग लिया। इस कार्यशाला में पूर्वी मध्य रेलवे, पूर्वी तट रेलवे, उत्तर पूर्वी रेलवे, उत्तर पूर्वी सीमांत रेलवे, उत्तरी रेलवे, दक्षिण पूर्वी रेलवे, दक्षिणी रेलवे और दक्षिण पश्चिमी रेलवे के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।

गौरतलब है कि एशिया में हाथियों का कुल आबादी का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा भारत में निवास करता है और ये क्षेत्र देश के पूर्वी, उत्तरपूर्वी, दक्षिणी और मध्य क्षेत्रों में फैले हुए हैं। आवासों के विखंडन और हाथियों के आवासों के ऊपर रेलवे अवसंरचना के विस्तार के कारण विशेष रूप से असम, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, ओडिशा, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में रेल पटरियों पर आने से होने वाली हाथियों की मृत्यु की दर में वृद्धि हुई है।

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से जारी विज्ञप्ति में कार्यशाला का उद्देश्य संरक्षण और अवसंरचना क्षेत्रों के बीच समन्वय को मजबूत करना और विज्ञान आधारित शमन रणनीतियों को बढ़ावा देना था।विज्ञप्ति में कहा गया है कि मंत्रालय ने डब्ल्यूआईआई और रेल मंत्रालय के साथ मिलकर हाथियों के आवासों में 110 संवेदनशील रेलवे खंडों और बाघों के आवास वाले दो राज्यों में 17 अतिरिक्त खंडों की पहचान की है।

मंत्रालय ने कहा है कि इस दौरान प्रोजेक्ट एलिफेंट, डब्ल्यूआईआई, राज्य वन विभागों और भारतीय रेलवे की टीमों ने व्यापक संयुक्त क्षेत्र सर्वेक्षणों में विशिष्ट स्थलों की पारिस्थितिक स्थितियों का मूल्यांकन किया और प्रत्येक स्थान के अनुरूप लक्षित शमन उपायों का प्रस्ताव रखा। इसके साथ ही 3,452.4 किलोमीटर में फैले 127 रेलवे खंडों के विस्तृत आकलन के आधार पर वन्यजीवों की आवाजाही के पैटर्न और पशु मृत्यु दर के जोखिम को ध्यान में रखते हुए 14 राज्यों में फैले 1,965.2 किमी के 77 खंडों को शमन के लिए प्राथमिकता दी गयी।

मंत्रालय ने बताया है कि इन प्राथमिकता वाले हिस्सों के लिए अनुशंसित शमन पैकेज में 503 रैंप और लेवल क्रॉसिंग, 72 पुलों का विस्तार और संशोधन, 39 बाड़ या खाई संरचनाएं, चार निकास रैंप, 65 नए अंडरपास और 22 ओवरपास शामिल हैं, जो कुल मिलाकर 705 शमन संरचनाओं के बराबर हैं, जिन्हें वन्यजीवों के सुरक्षित आवागमन को सुगम बनाने और दुर्घटनाओं को कम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

मंत्रालय ने कहा है कि इन सक्रिय उपायों के अलावा कई नयी रेलवे लाइनों और विस्तार परियोजनाओं (जिनमें पटरियों का दोहरा और तिहरीकरण शामिल है) में वन्यजीवों के अनुकूल बुनियादी ढांचा शामिल किया गया है। इनमें छत्तीसगढ़ में अचानकमार-अमरकंटक हाथी गलियारे से गुजरने वाली गेवरा रोड-पेंड्रा रोड रेलवे लाइन, महाराष्ट्र में दरेकासा-सालेकासा रेलवे ट्रैक को तिहरी करने की परियोजना और नागभिड़-इतवारी गेज रूपांतरण परियोजना तथा महाराष्ट्र में कान्हा-नावेगांव-ताडोबा-इंद्रावती बाघ गलियारे को पार करने वाली वाडसा-गडचिरोली रेलवे लाइन शामिल हैं।

मंत्रालय ने कहा कि असम में अजारा-कामाख्या रेलवे लाइन के 3.5 किलोमीटर लंबे संवेदनशील हिस्से पर एक महत्वपूर्ण परियोजना की योजना बनाई जा रही है। यह हिस्सा रानी-गरभंगा-दीपोर बील हाथी गलियारे से गुजरता है, जहां अतीत में कई हाथियों की मौत हो चुकी है। इस खंड को ऊंचा किया जाएगा ताकि गलियारे के पार हाथियों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित हो सके।

विज्ञप्ति में कहा गया है कि वन्यजीवों और ट्रेनों के बीच टक्कर को रोकने के लिए कई तकनीकी समाधानों का परीक्षण और कार्यान्वयन किया जा रहा है। एक उल्लेखनीय नवाचार ध्वनिक वितरण प्रणाली (डीएएस) पर आधारित घुसपैठ पहचान प्रणाली (आईडीएस), जिसे हाथियों के निवास वाले संवेदनशील रेलवे मार्गों पर लगाया जा रहा है। पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के अंतर्गत चार खंडों में पायलट परियोजनाएं सफलतापूर्वक शुरू की जा चुकी हैं, जिनमें असम के 64.03 किमी हाथी गलियारे और 141 किमी रेलवे ब्लॉक खंड शामिल हैं। अब इस प्रणाली को उत्तर बंगाल के संवेदनशील रेलवे खंडों और पूर्वी तट रेलवे के अंतर्गत ओडिशा के कुछ हिस्सों में भी लागू किया जा रहा है।

विज्ञप्ति के अनुसार एक और आशाजनक पहल तमिलनाडु के मदुक्कराई में स्थापित कृत्रिम बुद्धिमता (एआई)-आधारित पूर्व चेतावनी प्रणाली है, जो थर्मल और मोशन-सेंसिंग तकनीक से लैस 12 टावर-माउंटेड कैमरों के नेटवर्क का उपयोग करती है। यह प्रणाली रेलवे ट्रैक के 100 मीटर के दायरे में हाथियों की गतिविधि का पता लगाती है और स्वचालित रूप से वन और रेलवे अधिकारियों को सतर्क करती है, जिससे ट्रेनों को धीमा करने और हाथियों को सुरक्षित रूप से पार करने में सहायता मिलती है।

मंत्रालय के अनुसार कार्यशाला में हाथी पारिस्थितिकी क्षेत्र, अवसंरचना नियोजन और जैव विविधता संरक्षण पर तकनीकी सत्र शामिल थे, जिसमें वन्यजीव गलियारों को पार करने वाली रेल पटरियों के लिए संयुक्त नियोजन की आवश्यकता पर बल दिया गया। प्रतिभागियों ने राज्य स्तरीय आंकड़ों, केस स्टडी और प्रमुख दुर्घटना कारकों– पर्यावास विखंडन, भूमि उपयोग में परिवर्तन, ट्रेनों की गति, रात्रि संचालन और हाथियों के मौसमी आवागमन का विश्लेषण किया गया।

वहीं, इस दौरान क्षेत्रीय कार्य समूहों ने प्रमुख भू-भागों (शिवालिक-गंगा के मैदान, मध्य भारत और पूर्वी घाट, उत्तर-पूर्वी भारत, पश्चिमी घाट) में किए गए शमन प्रयासों की समीक्षा की। कमियों की पहचान की और भू-भाग-विशिष्ट रणनीतियों का सुझाव दिया। साझा की गई सर्वोत्तम विधियों में प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, सेंसर/एआई पहचान तकनीक, जीआईएस निगरानी और समुदाय-आधारित सतर्कता एवं गश्ती नेटवर्क शामिल थे।

कार्यशाला में रेलवे अधिकारियों, वन विभागों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय पर बल दिया गया, साथ ही जोखिम मूल्यांकन, निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया के लिए मानकीकृत प्रोटोकॉल पर भी बल दिया गया। चर्चाओं में दुर्घटना के संभावित क्षेत्रों और प्राथमिकता वाले मार्गों पर राष्ट्रीय सहमति को सुदृढ़ किया गया और उन्नत प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, समर्पित क्रॉसिंग, बेहतर संकेत और बेहतर डेटा साझाकरण की मांग की गयी।

 

 

 

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