पश्चिम एशिया युद्ध के बीच रूस बना भारत का संकटमोचक, कच्चे तेल के आयात में 50% का भारी उछाल, समुद्री मार्ग बाधित होने से रसोई गैस की किल्लत बरकरार

नई दिल्ली | पश्चिम एशिया में जारी भीषण तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से आपूर्ति ठप होने के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस का दामन मजबूती से थाम लिया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, मार्च महीने में भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद में 50 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी की है। फरवरी में जहां यह आयात 10.4 लाख बैरल प्रतिदिन (bpd) था, वहीं अब यह बढ़कर 15 लाख बैरल प्रतिदिन पहुँच गया है। भारत अपनी तेल जरूरतों का 88% हिस्सा आयात करता है, और पारंपरिक खाड़ी देशों के रास्ते बंद होने के बाद रूस एक भरोसेमंद विकल्प बनकर उभरा है।

कच्चे तेल की आपूर्ति संभलने के बावजूद देश में कुकिंग गैस का संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 60% एलपीजी (LPG) आयात करता है, जिसका 90 प्रतिशत हिस्सा युद्ध प्रभावित समुद्री मार्गों से होकर आता है। भारत में प्रतिदिन करीब 10 लाख बैरल गैस की खपत होती है, जबकि घरेलू उत्पादन इसकी तुलना में बेहद कम है। आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने के कारण महानगरों में घरेलू और कमर्शियल सिलेंडरों की भारी किल्लत देखी जा रही है, जिससे आम जनता और होटल उद्योग की कमर टूट गई है।

गैस संकट का सबसे बुरा असर कमर्शियल सेक्टर पर पड़ा है; दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में लगभग 20% रेस्टोरेंट बंद होने की कगार पर हैं। स्थिति को संभालने के लिए केंद्र सरकार ने अनिवार्य वस्तु अधिनियम लागू किया है और रिफाइनरियों को उत्पादन में 25% की बढ़ोतरी करने के निर्देश दिए हैं। कई स्थानों पर लोग अब मजबूरी में लकड़ी के चूल्हों और इलेक्ट्रिक इंडक्शन का सहारा ले रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से तेल लाना तो सफल रहा, लेकिन एलपीजी की सुचारू आपूर्ति बहाल करना अभी भी एक बड़ी कूटनीतिक और लॉजिस्टिक चुनौती बनी हुई है।

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