​गुरु का सम्मान: जब प्राचार्य की जिद पर चंद लम्हों के लिए अपनी स्कूल की पुरानी कुर्सी पर बैठीं अफसर प्राची

गंजबासौदा। जिस स्कूल में कभी एक साधारण छात्रा ने बड़े सपनों को आकार दिया था, वह उसी शिक्षा के मंदिर की चौखट को प्रणाम करने झुकीं तो एक पल के लिए लगा कि अफसर नहीं, संस्कार बड़े होते हैं. गांव की स्कूल की यह छात्र आज सिविल सेवा में चयनित अफसर के रूप में होकर लौटी तो स्वागत में गांव वालों शहर वालों को भी पीछे छोड़ दिया. शहर वालों ने स्वागत में पलक पांवड़े तो बिछाये ही गांव वालों ने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी स्वागत और तालियों की गूंज के बीच प्राची चौहान ने सबसे पहले विद्यालय की चौखट को प्रणाम किया और गुरुजनों के सामने विनम्रता से सिर झुका दिया. उस क्षण विद्यालय का आंगन गर्व, भावनाओं और प्रेरणा से भर उठा, मानो सफलता खुद अपने संस्कारों और शिक्षा को नमन करने लौट आई हो.

जो हम बात कर रहे हैं विदिशा जिले के ग्राम जोहद के एक साधारण से परिवार की होनहार बेटी प्राची चौहान की जिसने देश की सर्वोच्च प्रतियोगी परीक्षा सिविल सेवा में पूरे देश भर

में 260 सी रैंक हासिल की है अब चयनित सूची और मेरिट लिस्ट की पात्रतानुसार प्राची का जल्द ही आईएएस या फिर आईपीएस बनने का सपना पूरा होगा, तीन दिन पूर्व घोषित हुए परिणामों में सिविल सेवा परीक्षा में चयनित होने के बाद प्राची पहली बार दक्षिण एक्सप्रेस से गंजबासौदा से होते हुए करीब 15 किलोमीटर दूर अपने गृह ग्राम गांव जोहद पहुंची. नगर में प्रथम नगर आगमन पर आगमन पर नगर में उनका भव्य और ऐतिहासिक स्वागत हुआ. स्वागत रैली नगर के प्रमुख चौराहों से होते हुए जोहद के लिए रवाना हुई. स्वागत का क्रम स्थानीय रेलवे स्टेशन से प्रारंभप्रारंभ हुआ. स्वागत के दौरान खुली कार में सवार प्राची ने नगर के चौराहों पर स्थापित महापुरुषों की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण करते हुए एक नया संदेश समाज को

दिया कि योग्यता से बढ़कर महापुरुषों का बलिदान बंदनीय है.

मालूम हो कि देश को प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा में 260 वीं रैंक हासिल कर क्षेत्र का नाम रोशन करने वाली ग्राम जोहद निवासी प्राची चौहान के प्रथम नगर आगमन पर सोमवार को गंजबासौदा में ऐतिहासिक स्वागत हुआ. दिल्ली से दक्षिण एक्सप्रेस नगर पहुंचीं प्राची का नागरिकों ने दिल खोलकर अभिनंदन किया रेलवे स्टेशन पर उनके पहुंचते ही उनके स्वागत में परिजन, सामाजिक संगठन और बाड़ी संख्या में नागरिक मौजूद से रहे. यहां देवेंद्र सिंह राजपूत (मनुजी) ने प्राची को साफा बांधकर उनका अभिनंदन किया. साफा बांधने की विशेष शैली के लिए मनूजी का नगर में अपना अलग ही रिकॉर्ड माना

रघुवंश परमार्थ सेवा ट्रस्ट सहित कई सामाजिक, धार्मिक संगठनों ने किया स्वागत

स्टेशन से प्राची का स्वागत का क्रम शुरू हुआ जो सुभाष चौक, नेहरू चौक, अंबेडकर चौक, जय स्तंभ चौक, बरेठ रोड होते हुए तिरंगा चौक होते हुए ग्राम जोहत के लिए रवाना हुई. बरेठ रोड रघुवंशी धर्मशाला के पास रघुवंश परमार्थ सेवा ट्रस्ट और रघुकुल युवा परिषद द्वारा शॉल श्रीफल और प्रशस्ति पत्र देकर विधायक हरीसिंह रघुवंशी, ट्रस्ट अध्यक्ष रामकृष्ण सिंह रघुवंशी (राजखेड़ा) सहित

जाता है. इसके बाद खुले वाहन में उनका स्वागत जुलूस निकाला गया. ढोल-नगाड़ों, डीजे और जयघोष के बीच नगरवासियों ने जगह-जगह पलक पांवड़े बिछाकर और पुष्प वर्षा कर स्मृति चिन्ह देकर उनका स्वागत किया. ट्रेन से उतरकर नगर में प्रवेश करते ही प्राची चौहान ने विभिन्न चौराहों पर स्थापित महापुरुषों की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया और देश के महापुरुषों बलिदानियों भाषा के प्रति अपनी बद्धा व्यक्त की.

ट्रस्ट के अन्य पदाधिकारियों ने प्राची को सम्मानित किया. नवानपुर विद्यापीठ के प्राचार्य शैलेंद्र दीक्षित ने भी विद्यालय परिवार के साथ उनका अभिवादन कर सम्मान किया. इसके बाद उनका काफिला नगर के प्रमुख चौराहों से होते हुए उनके गृह ग्राम जोहद के लिए रवाना हुआ। रास्ते में ग्राम गुरोद में ग्रामीणों ने भी उनका भव्य स्वागत किया और फूल-मालाओं से अभिनंदन किया

कक्ष एक, दो तस्वीरें…. कभी संकोची छात्रा, आज आत्मविश्वास से भरी अफसर

प्राची के स्वागत का काफिला जब नगर से होते हुए उनके गांव जोहद पहुंचा तो सबसे पहले प्राची उस स्कूल में पहुंची जहां से उसे अपनी मंजिल का रास्ता मिला था. वाहन से उतरकर सबसे पहले उन्हेंनि विद्यालय में प्रवेश करते ही शिक्षा के मंदिर की दहलीज पर सिर रखकर प्रणाम किया. अपने स्कूल की सहपाठी और बड़ी दीदी की स्वागत इंतजार में बैठे विद्यालय विद्यार्थियों ने सलामी देकर उनका

स्वागत किया. स्कूल में स्वागत के दौरान वह दूश या भी अकल्पनीय बन गया जिसको किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल जोहद के प्राचार्य राकेश सेन अप्राचार्य तृप्ति अग्रवाल एवं शिक्षिका ममता उपाध्याय उन्हें से सम्मान प्राचार्य कक्ष में लेकर पहुंची. यही वह कक्ष था, जहां कभी प्राची चौहान एक संकोची छात्रा के रूप में अपनी शंकाओं के समाधान के लिए पहुंचती थीं और प्राचार्य के सामने बैठने में भी संकोच करती थीं. लेकिन वर्षों बाद वही प्राची सिविल सेवा परीक्षा में चयनित होकर जब अपने विद्यालय पहुंची, तो प्राचार्य सहित समस्त विद्यालय ने गर्व और खेह के साथ उनका स्वागत किया. प्राचार्य ने प्रशासनिक गरिमा और पद को ध्यान में रखते हुए अपने से बड़े एक अफसर को सम्मानपूर्वक अपनी कुर्सी पर बैठने का आग्रह किया. संस्कारों से भरी प्राची ने हाथ जोड़कर कई बार विनम्रता से कुर्सी पर बैठने मना किया, लेकिन प्राचार्य के आग्रह पर कुछ क्षण के लिए वह कुर्सी पर बैठीं. उस समय कक्ष में मौजूद सभी लोगों के सामने एक ही स्थान की दो तस्वीरें मानों एक साथ जीवंत हो उठीं थीं, कभी संकोची छात्रा और आज आत्मविश्वास से भरी एक अफसर गांव के उस साधारण से विद्यालय ने इस दृश्य में सच्चाई फिर साबित कर दी.

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