अब वेस्ट गोबर से जबलपुर में बनेगी लकड़ी, फरीदाबाद से जबलपुर पहुंचीं 2 मशीनें

जबलपुर। मंदिरों से निकले चढ़े फूलों से अर्पण गुलाल बनाने के नवाचार के बाद अब नगर निगम प्रशासन वेस्ट गोबर से लकड़ी बनाने की शुरूआत करने जा रहा है। इसके लिए फरीदाबाद से दो इलेक्ट्रिक मशीनें जबलपुर बुलवा ली गईं हैं। जानकारी के अनुसार सिंगल फेस मशीन की कीमत 57 हजार रुपए और थ्री फेस मशीन की कीमत 61 हजार रुपए है। जानकारी के अनुसार तिलवारा और उमरिया की गौशाला में ये दोनों मशीनें रख दीं गईं हैं।

निगमायुक्त रामप्रकाश अहिरवार ने नवभारत को बताया कि आगामी 7 दिनों के भीतर तिलवारा स्थित गौशाला में एक मशीन और दूसरी मशीन को उमरिया स्थित गौशाला में शुरू कर दिया जाएगा जहां गौसेवक वेस्ट गोबर से लकड़ी बनाने का काम करेंगे और फिर गौ काष्ट यूनिट से तैयार लकड़ी कम दामों में शहरवासियों को उपलब्ध होगी। निगमायुक्त ये भी स्पष्ट किया कि सामान्यत: लकड़ी के दामों से आधे दाम में गोबर की लकड़ी उपलब्ध होगी । निगमायुक्त ने यह भी बताया कि अभी प्रायोगिक तौर पर दो मशीनें लगाईं जाएंगीं और शहर के मुक्तिधामों में भी मशीनें लगाने 2 मशीनों का ऑर्डर दे दिया गया है। मतलब साफ है कि अंतिम संस्कारों में गोबर की लकड़ी का उपयोग किया जाएगा। निगमायुक्त और नगर निगम प्रशासन के इस नवाचार से पर्यावरण भी सुरक्षित होगा। गौरतलब है कि प्रदेश के कई ग्रामीण क्षेत्रों में पहले से ही लकड़ी के साथ गोबर के कंडों का उपयोग अंतिम संस्कार में किया जाता रहा है।

कुछ इस तरह बनेगी लकड़ी

नगर निगम के इस नवाचार से अब शहर में गोबर वेस्ट नहीं होगा। नगर निगम के वर्कशॉप के कार्यपालन यंत्री जीएस मरावी ने नवभारत को बताया कि गोबर को एक तरफ से मशीन में डाला जाएगा और दूसरी तरफ से लकड़ी बनकर निकलेगी। इस लकड़ी को फिर गौसेवक सुखाएंगे जिसके बाद लकड़ी बाजार में उपलब्ध होगी।

डेयरी संचालकों को शिक्षा लेने की जरूरत

नगर निगम कमिश्रर रामप्रकाश अहिरवार ने नवभारत से चर्चा के दौरान ये भी कहा कि नगर निगम के इस नवाचार से शहर व आसपास के डेयरी संचालकों को शिक्षा लेने की जरूरत है। डेयरी संचालकों ने निगमायुक्त ने अपील की है कि वे गौशाला आएं और मशीन के जरिए गोबर से लकड़ी बनाने की प्रक्रिया देखें और इसमें सहयोग प्रदान करें जिससे नालियों में न तो गोबर बहेगा और न कचरा फैलेगा। जानकारी के अनुसार अधिकांशत: देखा गया है कि डेयरी संचालकों द्वारा अपनी-अपनी डेयरियों से मवेशियों का गोबर पानी में बहा दिया जाता है और ये नालियों से बहकर पर्यावरण दूषित भी करता रहा है।

कुछ इस तरह के हो चुके हैं नवाचार….

–कबाड़ से कमाल के तहत कंडम मेट्रो बसों को रैनबसेरा, प्रसाधन और बच्चों के खेल क्षेत्र में बदला जा चुका है।

–मंदिरों से निकले अपशिष्ट फूलों से हर्बल गुलाल और रंगोली बनाने की शुरूआत व मंदिर के कचरे से धूपबत्ती बनाने की शुरूआत।

–वर्कशॉप की बेकार सामग्री से आकर्षक कलाकृतियां बनाकर शहर के उद्यानों और चौराहों पर स्थापित की गईं।

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