जबलपुर: हाईकोर्ट जस्टिस विवेक रूसिया तथा जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने अपने अहम आदेश में कहा है कि कर्मचारी कार्य करने के इच्छुक है तो ऐसी स्थिति में नो वर्क नो पे का सिद्धांत लागू नहीं होता है। युगलपीठ ने उक्त आदेश के साथ एकलपीठ के आदेश को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ताओं को बैंक वेज सहित सेवा संबंधित अन्य लाभ प्रदान करने के आदेश जारी किये हे।
रीवा निवासी फारेस्ट गार्ड राजेश कुमार पांडे सहित अन्य की तरफ से दायर की गयी याचिका में कहा गया था कि वन विभाग में साल 1980 में उनकी नियुक्ति दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी के पद पर हुई थी। उन्होने 20 साल से अधिक सेवा की थी। सर्वाेच्च न्यायालीय के आदेश पर प्रदेश सरकार ने उपयुक्त दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियो को फॉरेस्ट गार्ड पर स्थाई रूप से नियुक्ति करने का फैसला लिया था।
युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि अपीलकर्ता नोटिफिकेशन के ज़रिए शुरू की गई भर्ती प्रक्रिया के तहत सही तरीके से चुना गया था और उन्होंने साल 2008 में ही चयन के सभी स्टेज सफलतापूर्वक पूरे कर लिए थे। उस समय उनकी नियुक्ति न होना उनकी किसी गलती या अयोग्यता की वजह से नहीं था, बल्कि सिर्फ़ ज़िले के हिसाब से मेरिट लिस्ट बनाने की गलती की वजह से था, जिसे बाद में इस कोर्ट ने गैर-कानूनी घोषित कर दिया था और यह नतीजा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था।
अपीलकर्ताओं को रेट्रोस्पेक्टिव सीनियरिटी दी है। “नो वर्क नो पे” का सिद्धांत ऐसे मामले में मैकेनिकल तरीके से लागू नहीं किया जा सकता। कर्मचारी काम करने के लिए तैयार और इच्छुक था, लेकिन एम्प्लॉयर की गैर-कानूनी कार्रवाई की वजह से उसे ऐसा करने से रोक दिया गया। युगलपीठ ने अपीलकर्ताओं को सितंबर 2010 से बकाया सैलरी सहित अन्य लाभ प्रदान करने के आदेश जारी किये है।
