
नई दिल्ली, 2 मार्च (वार्ता) दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि सत्ता कोई विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि एक पवित्र सार्वजनिक विश्वास है जिसे समाज के अंतिम व्यक्ति की प्रगति के लिए उपयोग किया जाना चाहिए।
श्री विजेंद्र गुप्ता ने आज यहां ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ डेमोक्रेटिक लीडरशिप’ (आईआईडीएल) के छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि सत्ता कोई विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि एक पवित्र सार्वजनिक विश्वास है जिसका उपयोग समाज के अंतिम व्यक्ति की प्रगति के लिए किया जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि लोकतंत्र की ताकत केवल उसके कानूनों में नहीं, बल्कि राष्ट्र की सेवा करने वालों के नैतिक मूल्यों में निहित है। उन्होंने छात्रों से आग्रह किया कि वे स्वयं को भारत के भाग्य के भविष्य के शिल्पकार के रूप में देखें और जिम्मेदारी व विनम्रता के साथ आगे बढ़ें।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक नेतृत्व में युवाओं को प्रशिक्षित करने वाले संस्थान गणतंत्र की मजबूती के लिए अनिवार्य हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि शैक्षणिक सिद्धांत केवल एक आधार प्रदान करते हैं, लेकिन सार्वजनिक नीति और प्रशासन की जटिलताओं को समझने के लिए लोकतंत्र का अनुभव उसकी संस्थाओं के भीतर ही किया जाना चाहिए।
श्री विजेंद्र गुप्ता ने ‘विकसित भारत’ के विजन पर बल देते हुए कहा कि भारत की एक विकसित राष्ट्र बनने की यात्रा केवल एक आर्थिक लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह समावेशी और पारदर्शी शासन के प्रति एक प्रतिबद्धता है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के लिए ऐसे नेताओं की आवश्यकता है जो राष्ट्रीय हित में साहसिक निर्णय लेने का साहस और संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने की अखंडता रखते हों। उन्होंने जोर देकर कहा कि एक समृद्ध राष्ट्र के स्तंभ जिम्मेदार विधायकों, कुशल प्रशासकों और जागरूक नागरिकों के सामूहिक प्रयासों से निर्मित होते हैं।
श्री गुप्ता ने विधानसभा की दैनिक कार्यप्रणाली के अनुभव साझा किए, जहाँ बहस, विचार-विमर्श और सूक्ष्म जांच लोकतंत्र की नींव के रूप में कार्य करते हैं। उन्होंने समझाया कि विधायी प्रक्रिया यह सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण उपकरण है कि सरकार का प्रत्येक निर्णय जनता की आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करे। उन्होंने युवा पीढ़ी से राष्ट्र निर्माण का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भविष्य का भारत उन नेताओं पर निर्भर करेगा जो राष्ट्र को स्वयं से ऊपर और कर्तव्य को सुविधा से ऊपर रखेंगे। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि जैसे-जैसे तकनीक और अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है, उन्हें मानवीय संवेदनशीलता और नैतिक नेतृत्व के साथ निर्देशित किया जाना चाहिए, ताकि विकास की दौड़ में कोई भी पीछे न छूटे।
