नई दिल्ली | मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण भारतीय बाजारों में घबराहट का माहौल है। विशेषज्ञों का दावा है कि यदि युद्ध लंबा खिंचा, तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ₹10 से ₹15 तक की भारी बढ़ोतरी हो सकती है। अनुमान है कि दिल्ली में पेट्रोल ₹95 से बढ़कर ₹105 प्रति लीटर और डीजल ₹88 से उछलकर ₹96 प्रति लीटर तक पहुंच सकता है। भारत अपनी तेल जरूरतों का 90 प्रतिशत आयात करता है, जिसमें से लगभग आधा हिस्सा ‘होर्मुज स्ट्रेट’ के रास्ते आता है। यदि ईरान इस समुद्री मार्ग को ब्लॉक करता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं।
दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग ‘होर्मुज स्ट्रेट’ पर संकट गहराने से वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा सकती है। जानकारों के अनुसार, इस रास्ते के बंद होने से न केवल तेल महंगा होगा, बल्कि भारत के शेयर बाजार और सराफा बाजार पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ेगा। इतिहास गवाह है कि जब भी खाड़ी देशों में युद्ध हुआ है, ऊर्जा संकट गहराया है। 2022 के रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान भी कच्चे तेल की कीमतों में $80 से $130 तक का उछाल देखा गया था। वर्तमान परिस्थितियों में भारत के लिए अपने ऊर्जा भंडार को सुरक्षित रखना और वैकल्पिक मार्गों की तलाश करना एक बड़ी चुनौती बन गई है।
ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि वैश्विक युद्धों ने हमेशा ईंधन की कीमतों को बेतहाशा बढ़ाया है। 1973 के इजराइल-अरब युद्ध के दौरान कच्चे तेल की कीमतें चार गुना बढ़ गई थीं, वहीं 1990 के इराक-कुवैत युद्ध और 2003 के इराक-अमेरिका युद्ध के समय भी भारत में पेट्रोल के दामों में भारी वृद्धि दर्ज की गई थी। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान तनाव अगर क्षेत्रीय युद्ध में तब्दील हुआ, तो सोने और चांदी की कीमतें सुरक्षित निवेश के रूप में और अधिक बढ़ेंगी, जबकि आम आदमी की जेब पर पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के रूप में महंगाई की चौतरफा मार पड़ेगी।

