
खरगोन। पश्चिमी मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों में होली का डंडा गाड़ने के दिन से लेकर होलिका दहन तक किसी भी प्रकार के शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं।
बड़वानी, खरगोन सहित अन्य आदिवासी बहुल जिलों में भील, भिलाला और बारेला समाज के लोग सदियों पुरानी इस परंपरा का आज भी सख्ती से पालन करते हैं। कई गांवों में होली का डंडा गाड़ने की रस्म पूरी हो चुकी है, जिसके बाद शादी, सगाई, गृह प्रवेश, मकान निर्माण और संपत्ति के लेन-देन जैसे सभी मांगलिक कार्य अस्थायी रूप से स्थगित कर दिए गए हैं। समाज के लोग इस अवधि को जीवन के बड़े कार्यों के लिए अशुभ मानते हैं।
खरगोन जिले के भगवानपुरा स्थित शासकीय कॉलेज के प्राचार्य एवं आदिवासी विकास परिषद के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. प्रकाश सोलंकी ने बताया कि इस परंपरा के पीछे सामाजिक और आर्थिक दोनों कारण जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि होली का डंडा गाड़ने से लेकर होलिका दहन तक विवाह और अन्य शुभ कार्यों पर पूर्ण रोक रहती है। यह अवधि पारंपरिक भोंगर्या अर्थात भगोरिया हाट के समय से मेल खाती है, जो होलिका दहन से लगभग एक सप्ताह पूर्व आरंभ होकर त्योहार तक चलते हैं।
डॉ. सोलंकी के अनुसार यह समय ऐसा होता है जब आदिवासी समुदाय कृषि कार्यों से अपेक्षाकृत मुक्त रहता है और हाल ही में उपज बेचकर आय अर्जित करता है। यदि इसी दौरान विवाह जैसे बड़े आयोजन किए जाएं तो परिवारों की मौसमी आय का बड़ा हिस्सा खर्च हो सकता है, जिससे वर्ष भर आर्थिक दबाव की स्थिति बन सकती है। इसलिए शुभ कार्यों पर अस्थायी रोक सामाजिक परंपरा के साथ-साथ आर्थिक संतुलन का भी प्रतीक है।
आदिवासी मामलों के विशेषज्ञ गजानंद ब्राह्मणे ने बताया कि होली का डंडा स्थापित होने के बाद होलिका दहन तक कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किया जाता। उन्होंने कहा कि होली के बाद अगले महीने को स्थानीय लोग कल्ला महीना कहते हैं, जब खेतों में गेहूं की कटाई होती है। इस दौरान लेन-देन सीमित रहता है और परिवार कृषि कार्यों तथा आगामी आयोजनों की तैयारी पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
उन्होंने बताया कि अक्षय तृतीया, जिसे स्थानीय रूप से आखा तीज कहा जाता है, के बाद पुनः विवाह और अन्य शुभ कार्यों की शुरुआत होती है और पूरे क्षेत्र में उत्सव का वातावरण बन जाता है।
इधर, हिंदू परंपरा के अनुसार होलाष्टक के दौरान भी विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन या नए कार्यों का शुभारंभ नहीं किया जाता। यह अवधि फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक मानी जाती है, जो होलिका दहन के साथ समाप्त होती है।
