कार्तिक आर्यन की फिल्म ‘लुका छुपी’ के प्रदर्शन के सात साल पूरे

मुंबई, 01 मार्च (वार्ता) बॉलीवुड स्टार कार्तिक आर्यन की फिल्म ‘लुका छुपी’ के प्रदर्शन के सात साल पूरे हो गए हैं।’लुका छुपी’ को सिर्फ़ एक रोमांटिक कॉमेडी के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसी फिल्म के रूप में याद किया जाता है, जिसने यह दिखाया कि अगर कहानी सच्ची और ज़मीन से जुड़ी हो, तो मिड-बजट की फिल्म भी बड़ा कमाल कर सकती है।

इस फिल्म ने भारत में लिव-इन रिलेशनशिप जैसे संवेदनशील विषय को बड़े हल्के और समझदारी भरे अंदाज़ में दिखाते हुए छोटे शहरों और मध्यमवर्गीय परिवारों की सोच को सामने रखा। निर्देशक विशेष रूप से लक्ष्मण उतेकर ने मुद्दे को न तो ज़्यादा गंभीर बनाया और न ही बेवजह चौंकाने वाला बनाया, बल्कि हंसी, भावनाओं और पारिवारिक उलझनों के ज़रिये इस तरह पेश किया, जिससे हर उम्र के दर्शक इससे जुड़ गए।

मैडॉक फिल्म्स के बैनर तले बनी इस फिल्म का निर्माण दिनेश विजान ने किया था। लगभग 25 करोड़ के बजट में बनी यह फिल्म पूरी तरह मिड-बजट कैटेगरी में थी। बड़े-बड़े आलिशान सेट और भारी वीएफएक्स की बजाय फिल्म का आधार थी साफ़ कहानी, और इसी के साथ थी आम लोगों जैसे किरदार और रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ा कॉन्सेप्ट।

‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ की बड़ी सफलता के बाद यह फिल्म कार्तिक आर्यन के लिए बहुत अहम भी थी क्योंकि कुछ लोगों को लगा था कि उनकी पिछली हिट बस एक संयोग मात्र । हालांकि ‘लुका छुपी’ ने लोगों की यह सोच पूरी तरह बदल दी। बिल्कुल अलग किरदार और माहौल में भी कार्तिक ने ये साबित कर दिया कि दर्शक उनसे सच में जुड़ते हैं।

इसके साथ ही बॉक्स ऑफिस पर भी फिल्म ने शानदार प्रदर्शन करते हुए दुनियाभर में 125 करोड़ से ज़्यादा की कमाई की थी और अपने साल की सबसे मुनाफ़ेदार फिल्मों में शामिल हो गई थी। मिड-बजट फिल्म के हिसाब से यह एक साफ़ ब्लॉकबस्टर थी।

फिल्म में कार्तिक का ‘गुड्डू शुक्ला’ का किरदार खास तौर पर पसंद किया गया था, जो प्यार, परिवार और समाज की उम्मीदों के बीच फंसा हुआ एक आम सा छोटा शहर का लड़का है। यही सादगी और सच्चाई युवाओं को फिल्म से जोड़ती है।

यही वजह है कि सात साल बाद भी ‘लुका छुपी’ इसलिए याद की जाती है, क्योंकि यह बिना शोर मचाए, बिना दिखावे के, अपनी कहानी और सोच के दम पर सफल हुई। इसने न सिर्फ़ कार्तिक आर्यन की मज़बूत जगह साबित की, बल्कि यह भी दिखाया कि सही सोच और सच्ची कहानी के साथ मिड-बजट हिंदी फिल्में भी बड़ा असर छोड़ सकती हैं।

 

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