
दमोह। संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग से युवा नाट्य मंच द्वारा आयोजित 21वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह का शुभारंभ गुरुवार को हुआ.नगर के अस्पताल चौक स्थित मानस भवन में आयोजित नाट्य समारोह के प्रथम दिवस मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय रंग प्रयोगशाला के कलाकारों के प्रसिद्ध उपन्यासकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की कालजयी रचना आनंद मठ की नाट्य प्रस्तुति दी. कहानी का नाट्य रूपांतरण राजीव श्रीवास्तव ने और निर्देशन संजय श्रीवास्तव ने किया है.
नाटक 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, बंगाल में हुए सन्यासी विद्रोह और भीषण अकाल की सच्ची पृष्ठभूमि पर आधारित है, जो भारतीय जनमानस के राष्ट्रवाद, मातृभूमि के प्रति समर्पण और सांस्कृतिक चेतना और गुलामी की वेदना को दिखाता है.नाटक न केवल इतिहास, तत्कालीन सामाजिक स्थिति, संस्कृति और राष्ट्र प्रेम के संगम को बल्कि हमारी युवा पीढ़ी को अपनी अस्मिता और राष्ट्र के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेवारी का एहसास भी कराता है.
सन्यास जीवन में मातृभूमि की भक्ति
नाटक की कहानी में पात्र महेंद्र और उनकी पत्नी कल्याणी बंगाल के भयंकर अकाल के कारण अपना घर छोड़ने को विवश हो जाते हैं. नियति के चलते घर से निकलने के बाद मार्ग में दोनों बिछुड़ जाते हैं और भटकते हुए महेंद्र एक रहस्यमय स्थान आनंदमठ पहुंच जाता है. आनंदमठ में उसे ऐसे संन्यासी मिलते हैं जिन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग कर मातृभूमि की सेवा को अपना धर्म बना लिया है.उनके अनुशासन, बलिदान और देशप्रेम से प्रभावित होकर महेंद्र भी इसी कार्य को अपना ध्येय बना लेता है.समय के साथ कठिनाइयों को झेलते हुए उसकी पत्नी कल्याणी भी आनंदमठ पहुंचती है और वह भी यह आत्मसात करती है कि व्यक्तिगत सुख से ऊपर राष्ट्रधर्म है. नाटक में संन्यासियों और विदेशी सत्ता के बीच संघर्ष के दृश्य प्रासंगिक हैं, जिनके केंद्र में ‘वदे मातरम’ की गूंज है.
मानवीय परेशानियों से ऊपर राष्ट्रधर्म
कहानी में निर्देशक ने गुलामी के दौर में भी अकाल और जनजीवन के संघर्ष के बीच राष्ट्रधर्म की भावना को दिखाया है.अकाल, परेशानी और गरीबी में इंसान की भूख, मानव के अंदर छिपी बुराइयां जिसमें वह दानव बनकर एक दूसरे को लूट-मार करने पर आमदा हो गया था.दूसरी ओर एक ऐसे सन्यासी जो अपने व्यक्तिगत सुखों और घर परिवार को त्याग कर संतान सेना के रूप में मातृभूमि की रक्षा के लिए समर्पित भाव से एकजुट होकर अंग्रेजों के राष्ट्र सर्वोपरि मानकर अपना संघर्ष रखते है. नाटक का देशकाल भले ही 18वीं शताब्दी का हो लेकिन इसकी कहानी और इसके दृश्य वर्तमान परिवेश और हालातो से बखूबी मेल खाते हैं.
कहानी की मूल आत्मा को रखा जीवित
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय जी की कहानी आनंदमठ राष्ट्र भावना से जुड़ी एक ऐसी कहानी है जो दशकों से जनमानस के मन में अपनी अमिट छाप बनाकर रखे हुए है। ऐसे में निर्देशक संजय श्रीवास्तव ने कहानी की मूल आत्मा को जीवित रखा है. नाटक को पात्रों ने अपने अभिनय से जीवंत किया है और संगीत इस नाटक की आत्मा है. कलाकरों में सत्यानंद के रूप में अभिषेक शाही और लक्ष्य अरोड़ा, भवानंद रोशन अवधिया, जीवानंद वरुण शर्मा, धीरानंद आकाश घोरमारे,शांति व नवीनानंद के पात्र में गीतिका देवदास ने अभिनय को पूर्णता दी है.महेंद्र के पात्र में कशफ़ अहमद ख़ान,कल्याणी एकता चौरसिया,निम्मी गीता अहिरवार, संतानसेना सदस्य जुधिष्ठिर सुनानी, मोंटी मूस, शुभम चौरसिया, देवाशीष मोहंत, संजय इंगले के साथ ग्रामीण की भूमिका को, रोशन अवधिया, गीतिका देवदास,आकाश घोरमारे, जुधिष्ठिर सुनानी अपनी भूमिका में सशक्त रहे है.अंग्रेज़ अफ़सर की भूमिका में कलाकारों ने प्रभावी दृश्य पैदा किए है. संजना तिवारी ने पात्रों की भेषभूषा का साकार किया है और उनकी सहायता रोशन अवधिया और राकेश नामदेव ने की है.रूपसज्जा में एकता चौरसिया, कशफ़ अहमद ख़ान
का सहयोग रहा है, मंच सामग्री में गीतिका देवदास, वरुण शर्मा, मंच परिकल्पना में आकाश विश्वकर्मा रहे है.इसके अलावा आकाश विश्वकर्मा ने प्रकाश परिकल्पना एवं संचालन से दृश्यों में प्रभाव पैदा किया है. नाटक में अभिनय कहानी के साथ संगीत की जबरजस्त जुगलबंदी है और संगीत पक्ष और वाद्ययंत्रों की जिम्मेदारी निभाई है उमेश तरकसवार, मयंक विश्वकर्मा, अभिषेक दुबे, आदित्य गौतम संजय कोरी, विशाल कुशवाहा, अभिषेक शाही, आकाश घोरमारे ने.
आज होगी गुड़िया की शादी की प्रस्तुति
समारोह के द्वितीय दिवस शुक्रवार को मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय के द्वारा हास्य नाटक गुड़िया की शादी की प्रस्तुति की जाएगी.यह नाटक बुंदेलखंड माटी के विवाह उत्सव की परंपराओं और उससे जुड़े जीवन को हास्य रूप में दिखाता है.
