
ग्वालियर। भारत की भू-वैज्ञानिक विरासत विश्व स्तर पर विशिष्ट पहचान रखती है। मध्य प्रदेश में अनेक ऐसे भू-धरोहर स्थल हैं, जो पृथ्वी के करोड़ों वर्ष पुराने इतिहास को संजोए हुए हैं। इन स्थलों का वैज्ञानिक अध्ययन, प्रलेखन और संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। पृथ्वी संयोग से बनीं है इसे हमको बचाना होगा। यह बात बुधवार को बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पेलियोसाइंसेज के निदेशक प्रो. महेश जी. ठक्कर ने जेयू के स्कूल ऑफ स्टडीज इन अर्थ साइंस द्वारा “मध्य प्रदेश के भूविज्ञान और भू-विरासत स्थलों के प्रबंधन में भारतीय ज्ञान प्रणाली” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि कही। डॉ. सतीश त्रिपाठी, रिटायर्ड प्रो.यूसी सिंह, डॉ.राजकुमार आचार्य, प्रो.विवेक बापट, प्रो.एसएन महापात्रा मंचासीन रहे। प्रो.विवेक बापट के स्वागत भाषण के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।प्रो.एसएन महापात्रा ने कार्यक्रम की रूपरेखा बताई। विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित प्रो. यू.सी. सिंह ने कहा कि भारतीय परंपरा में प्रकृति को ‘माता’ के रूप में पूजने की अवधारणा पर्यावरण संरक्षण का मूल आधार रही है। यदि हम अपने पारंपरिक मूल्यों को व्यवहार में लाएं तो पर्यावरणीय संकटों का समाधान संभव है। उन्होंने कहा कि भू-धरोहर स्थलों को पर्यटन, शिक्षा और शोध के केंद्र के रूप में विकसित कर स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी सशक्त किया जा सकता है। वक्ता के रूप में उपस्थित भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण भारत के पूर्व उपमहानिदेशक डॉ. सतीश त्रिपाठी ने कहा कि भारत में भू-धरोहर संरक्षण की अपार संभावनाएं हैं, किंतु जागरूकता और नीति-निर्माण के स्तर पर समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलगुरू डॉ. राजकुमार आचार्य ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध है। उन्होंने कहा कि प्राचीन भारतीय ग्रंथों में पृथ्वी, जल, खनिज और पर्यावरण संरक्षण के जो सिद्धांत वर्णित हैं, वे आज के सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप हैं। विश्वविद्यालय का दायित्व है कि वह पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक शोध से जोड़ते हुए समाजोपयोगी मॉडल विकसित करे। डॉ. आचार्य ने कहा कि भू-धरोहर स्थलों का संरक्षण केवल वैज्ञानिक दायित्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है। कार्यक्रम के दौरान सभी अतिथियों को शॉल श्रीफल व स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया।
