पानी की ही नहीं, दूध में दूध की भी हो रही है मिलावट

इंदौर: कुछ समय पहले प्रशासन द्वारा डेरियों में दूध की गुणवत्ता जांचने के लिए मशीनें रखना अनिवार्य किया गया था लेकिन उसके बाद लगातार निगरानी नहीं होने से ये मशीनें या तो हटा ली गईं या बंद पड़ी हैं. इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है, जिन्हें शुद्ध दूध मिलने की गारंटी नहीं रह गई है.इंदौर में बड़ी मात्रा में दूध का व्यापार होता है. शहर और आसपास के क्षेत्रों से रोजाना हजारों लीटर दूध स्थानीय डेरियों में आता है.

मांग और आपूर्ति के अंतर को देखते हुए मिलावटी दूध की आशंका भी बनी रहती है. ऐसे में जांच मशीनों की अनुपस्थिति से मिलावट की जांच प्रभावी रूप से नहीं हो पा रही है. कुछ समय पहले प्रशासन ने डेरियों में दूध की गुणवत्ता जांचने के लिए फैट और एसएनएफ मापने वाली मशीनें रखना अनिवार्य किया था, लेकिन लगातार निगरानी नहीं होने से अधिकांश स्थानों पर ये मशीनें या तो हटा ली गईं या बंद पड़ी हैं. इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है, जिन्हें शुद्ध दूध मिलने की गारंटी नहीं रह गई है.

पहले थी सख्ती, अब ढिलाई
जानकारी के मुताबिक, पिछली कार्रवाई के दौरान प्रशासन ने करीब 800 से 900 डेरियों में मशीनें लगवाई थीं. शुरुआती दिनों में नियमित जांच से मिलावट करने वालों में हड़कंप मच गया था. लेकिन समय बीतने के साथ मशीनों का रखरखाव नहीं हुआ और निरीक्षण भी कम हो गया. नतीजतन अब अधिकतर डेरियों में ऑन-द-स्पॉट जांच की सुविधा नदारद है. हालांकि कुछ प्रतिष्ठित संस्थान अब भी काउंटर पर फैट जांच मशीन रखे हुए हैं.

उत्पादन से ज्यादा खपत, बढ़ी चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि शहर में दूध की खपत स्थानीय उत्पादन से अधिक है. ऐसे में बाहरी जिलों से दूध की आपूर्ति होती है, जिससे मिलावटी दूध की आशंका बढ़ जाती है. यदि डेरियों में मौके पर ही जांच की व्यवस्था हो तो गुणवत्ता पर बेहतर नियंत्रण संभव है.

उपभोक्ताओं की मांग
स्थानीय नागरिकों और उपभोक्ता संगठनों ने प्रशासन से मांग की है कि दोबारा जांच मशीनें स्थापित की जाएं और नियमित जांच सुनिश्चित की जाए वहीं दूसरी ओर किसानों द्वारा लाए जा रहे दूध की भी जाँच होना चाहिए.

व्यापारी ही क्यों जांच में उलझेः भरत मथुरावाला
दूध संघ अध्यक्ष भरत मथुरावाला का कहना है कि अब कुछ किसान पानी मिलाने के बजाय जर्सी गाय का दूध मिलाकर सप्लाई कर रहे हैं. जर्सी गाय का उत्पादन अधिक और लागत कम होने से फैट में बड़ा उतार-चढ़ाव नहीं दिखता, लेकिन गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है. गाय का दूध भैंस के दूध की अपेक्षा थोड़ा सस्ता होता है. उनका सवाल है कि हर बार व्यापारी ही जांच के दायरे में क्यों आए, जबकि दूध ग्रामीण क्षेत्रों से आता है. जिले में एंट्री पॉइंट पर प्रशासन मोबाइल लैब के जरिए दूध की जांच करे. इस संबंध में कोर्ट के निर्देश भी हैं. उनका कहना है कि दूध रोजमर्रा की जरूरत है और इसमें मिलावट सीधे स्वास्थ्य से जुड़ा मामला है.

जांच प्रक्रिया पर आपत्तिः हेमराज चंदेल
क्षेत्र के किसान हेमराज चंदेल ने भैंस और जर्सी गाय के दूध की जांच प्रक्रिया पर आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि दोनों के दूध में फैट की मात्रा अलग होती है, लेकिन जांच के दौरान इस अंतर को सही तरीके से नहीं माना जाता, जिससे किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है. उन्होंने कहा कि भैंस का दूध उत्पादन कम और लागत अधिक होती है, जबकि जर्सी गाय का उत्पादन ज्यादा और लागत कम है. दूध उत्पादक दोनों का दूध मिलाकर बेचते हैं जिससे फैट की मात्रा कुछ कम हो जाती है और अधिकारी इस कम फेट की मात्रा में किसानों पर जुर्माना लगा देते हैं जिससे किसानों को जांच कराने में आपत्ति होती है क्योंकि भैंस का दूध और गाय का दूध मिलने के बाद फैट कम बैठता है जिससे अधिकारियों को लगता है कि इसमें मिलावट की गई है जबकि किसान जो दूध शहर भेजता है उसमें गाय और भैंस का दूध मिला होता है जिससे फैट की कुछ मात्रा कम हो जाती है इससे किसान को 10/15रूपये की कमाई हो जाती है.

प्रशासन का पक्ष
खाद्य विभाग अधिकारी मनीष स्वामी के अनुसार, समय-समय पर सैंपल लेकर लैब में जांच कराई जाती है. हालांकि डेरियों में ऑन-द-स्पॉट जांच की सुविधा बहाल करने को लेकर फिलहाल कोई स्पष्ट योजना नहीं है, क्योंकि अधिनियम में इसका प्रावधान नहीं है. पिछली बार कलेक्टर द्वारा धारा 144 के निर्देश पर यह व्यवस्था लागू की गई थी. हालांकि यदि कोई उपभोक्ता चाहे तो वह मिलावटी दूध की जांच मोबाइल लेकर या निजी लेब पर करवा सकता है और उस आधार पर सूचना के माध्यम से प्रशासन कार्रवाई करेगा.

आंकड़ों में हकीकत

2023-2024
दूध के नमूनेः 34
फेलः 15
दुग्ध उत्पाद नमूनेः 220
फेलः 70
2024-2025
दूध के नमूनेः 29
फेलः 1
दुग्ध उत्पाद नमूनेः 228
फेलः 44

2025-2026
28 डेरियों से 42 नमूने लिए गए
27 रिपोर्ट प्राप्त, सभी मानक स्तर के
15 नमूनों की रिपोर्ट आना बाकी

आंकड़े बताते हैं कि मिलावट की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई. ऐसे में डेरियों पर जांच मशीनों की वापसी और एंट्री पॉइंट पर मोबाइल लैब जांच करना समय की मांग बन गया है.

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