
जबलपुर। दहेज हत्या के मामले में मृत्यु के पूर्व परेशान किया जाना साबित करना आवष्यक है। मृतिका के शरीर पर कोई चोट के निशान नही थे। जिससे क्रूरता का कोई मज़बूत और भरोसेमंद सबूत मिल सके। हाईकोर्ट जस्टिस विवेक अग्रवाल तथा जस्टिस आर सी एस बिसेन की युगलपीठ ने दहेज हत्या के आरोप में आरोपी पति को दोषमुक्त किए जाने के फैसले को सही ठहराते हुए सरकार की अपील को खारिज कर दिया।
सरकार की तरफ से दायर की गयी अपील में धारा 304 बी तथा 498 ए के तहत आरोपी पति किशन उर्फ लाल साहू को अनूपपुर जिला न्यायालय द्वारा दोषमुक्त किए जाने को चुनौती दी गयी थी। अपील में कहा गया था कि राधा का विवाह आरोपी किशन साहू के साथ साल 2012 में हुआ था। शादी के कुछ साल बाद आरोपी उसे दहेज में मोटर साइकिल व नगद रूपये की मांग करते हुए प्रताडित करने लगा। शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताडित होने के कारण उसनरे 2 फरवरी 2018 को ज़हरीली वस्तु का सेवन कर लिया था। जिसके उपचार के दौरान 8 फरवरी 2018 को मौत हो गयी थी। पुलिस ने जांच के बाद आरोपी के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया था। ट्रायल कोर्ट ने मौजूदा रिकॉर्ड व सबूतो पर ठीक से विचार नहीं करते हुए आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।
युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि गवाहों ने स्वीकार किया है कि शादी के समय दहेज की मांग नहीं की गयी थी। पुलिस के द्वारा गांव के किसी व्यक्ति के बयान दर्ज नहीं किये गये है। मृतिका के शरीर में किसी प्रकार की चोट के निशान नही पाये गये थे। अभियोजन यह साबित करने में नाकाम रहा कि उसे दहेज के लिए परेशान किया गया था। दहेज हत्या में मृत्यु पूर्व परेशान किया जाना साबित करना आवश्यक है। युगलपीठ ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को उचित करार देते हुए सरकार की अपील को खारिज कर दिया।
