संयुक्त राष्ट्र : एआई का विकास मानवाधिकारों की नींव पर हो

नयी दिल्ली, 21 फरवरी (वार्ता) संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क ने कहा है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की तकनीक का संचालन एक ऐसे मानवाधिकार ढांचे के माध्यम से किया जाना चाहिए जो पारदर्शिता, जवाबदेही और समावेशिता सुनिश्चित करे। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र समाचार संकलन सेवा को दिए एक साक्षात्कार में एआई को एक शक्तिशाली तकनीकी उपकरण बताते हुए कहा कि इसका विकास ‘जोखिम मूल्यांकन’ के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि तकनीक का उपयोग सत्ता के प्रयोग के लिए किया जाता है, चाहे वह अच्छे के लिए हो या बुरे के लिए, इसलिए इसे मानवाधिकारों के दायरे में लाना आवश्यक है। उनके अनुसार, मानवाधिकार ही वह दृष्टि प्रदान करते हैं जो एक बेहतर दुनिया की कल्पना करने में मदद करती है। उन्होंने एआई के तेजी से विस्तार से होने वाले सबसे बड़े खतरों के बारे में चर्चा करते हुए कहा एआई का विकास और उपयोग दुनिया के हर हिस्से में होना चाहिए, न कि केवल कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में। उन्होंने चिंता प्रकट करते हुए कहा कि अगर डेटा केवल दुनिया के एक हिस्से से एकत्र किया जाता है और केवल पुरुष ही इसे विकसित करते हैं, तो इसमें ‘अचेतन पूर्वाग्रह’ आ जाएगा। कमजोर समूहों और अल्पसंख्यकों की भागीदारी के बिना एआई समाज के लिए हानिकारक हो सकता है। उन्होंने कहा कि कुछ कंपनियों का बजट छोटे देशों की अर्थव्यवस्था से भी बड़ा है। यह शक्ति स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में लाभ पहुंचा सकती है, लेकिन इसका दुरुपयोग घातक स्वायत्त हथियारों, दुष्प्रचार और घृणा फैलाने के लिए भी किया जा सकता है।

श्री वोल्कर तुर्क ने म्यांमार का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे सोशल मीडिया पर रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए एआई एल्गोरिदम का दुरुपयोग हुआ। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि हम जागरूक नहीं रहे, तो हम ‘फ्रेंकस्टीन के राक्षस’ जैसा कुछ बना देंगे जो हमारे नियंत्रण से बाहर हो जाएगा। उन्होंने बताया कि कई महिला राजनेता सोशल मीडिया पर बढ़ती स्त्री-द्वेष के कारण राजनीति छोड़ने पर विचार कर रही हैं। भविष्य के बारे में बात करते हुए उन्होंने आशा व्यक्त की कि पांच साल बाद एआई का विकास केवल उत्तरी अमेरिका की मुट्ठी भर कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा। वह एक ऐसे समावेशी विकास की कल्पना करते हैं जो जलवायु संकट, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा जैसी वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने में मदद करे। उन्होंने आगाह किया कि यदि सही दृष्टि नहीं अपनाई गई, तो हम एक ऐसी ध्रुवीकृत दुनिया में होंगे जहाँ युद्ध मनुष्यों के नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं।

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