कैलाश मित्तल
इंदौर:निमाड़-मालवा अंचल की धरती पर एक बार फिर जीवंत आदिवासी पर्व भगोरिया की आहट सुनाई देने लगी है. अलीराजपुर, झाबुआ , बड़वानी धार जिले में पूरे एक सप्ताह तक अलग-अलग गांवों में लगने वाले हाट-बाज़ार इस उत्सव की रौनक से भर उठते हैं. जिस दिन जिस गांव में बाजार होता है, उसी दिन वहां भगोरिया अपने पूरे रंग में दिखाई देता है.इस पर्व में आसपास के गांवों से लोग परिवार सहित शामिल होने आते हैं.
दूर से आते कदमों में उत्साह होता है, चेहरों पर मुस्कान और मन में मेले की खुशी. लोग पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे नजर आते हैं. रंग-बिरंगे कपड़े, चांदी के आभूषण, सिर पर साफा और ढोल-मांदल की थाप पूरे वातावरण को जीवंत बना देती है. मेले में झूले लगते हैं, बच्चों की हंसी गूंजती है, दुकानों पर चूड़ियाँ, खिलौने, गहने और स्थानीय पकवान सजे रहते हैं. सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे तक मेला अपने पूरे शबाब पर रहता है.
यही वो समय होता है जब हर गली, हर चौपाल और हर दुकान पर रौनक चरम पर दिखाई देती है. धूल भरी पगडंडियों पर चलते लोग, मिलते-जुलते रिश्तेदार और हंसी-ठिठोली करते युवा- सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते हैं जो दिल में बस जाता है.भगोरिया सिर्फ एक दिन का बाजार नहीं, यह मिलन का अवसर है, अपनापन महसूस करने का समय है. यहाँ आकर लगता है जैसे पूरा अंचल एक परिवार बन गया हो. जो लोग भगोरिया देखने आते हैं, वे सिर्फ रंग नहीं देखते, वे संस्कृति की धड़कन को महसूस करते हैं. यह उत्सव एक सप्ताह तक चलता है, लेकिन इसकी यादें लंबे समय तक मन में गूंजती रहती हैं.
